प्रकाश कुमार पाण्डेय
लखनऊ. अपना उत्तर प्रदेश वैसे तो आए दिन नए कीर्तिमान स्थापित करता है, लॉ एंड ऑर्डर पर जमकर बात करता है लेकिन इसी उत्तर प्रदेश से ऐसी भी खबर है जो आपको गर्व के जगह पर शर्म का अहसास दिलाएगी. उत्तर प्रदेश रैगिंग के मामले में देश का नंबर वन प्रदेश बन गया है. इसके बाद पश्चिम बंगाल और फिर मध्यप्रदेश का नंबर आता है.
यह अनचाहा रिकॉर्ड 2009 से 2019 तक दर्ज शिकायतों के आधार पर बना है. पिछले एक दशक में रैगिंग के मामले तकरीबन 3 गुना बड़े हैं. 2009 में 343 शिकायत दर्ज हुई और 2019 तक यानी कुल 10 सालों में 6 958 मामले दर्ज किए गए.
अगर साल दर साल पिछले दस वर्षों का रिकॉर्ड उठाएं तो
वर्ष मामले
2009 345
2010 435
2011 577
2012 375
2013 640
2014 543
2015 423
2016 515
2017 901
2018 1016
2019 1070
2020 118
मामले रैगिंग के दर्ज किए गए हैं.
वहीं अगर रैगिंग के मामले में सज़ा की बात करें तो उपलब्ध डाटा के अनुसार
- 2012 में 306 शिकायतें दर्ज हुई जिसमें अट्ठारह को सजा मिली
- 2013 में 640 शिकायतें दर्ज हुई जिसमें 24 को सजा मिली
- 2014 में 543 शिकायतें दर्ज हुई जिसमें 149 को सजा हुई
- 2015 में 423 रैगिंग के मामले दर्ज किए गए जिसमें 214 को सजा हुई
- 2016 में 515 मामले दर्ज किए गए जिसमें 162 लोगों को सजा हुई
- वहीं अगर 2017 की बात करें तो 872 मामले दर्ज किए गए जिसमें 390 को सजा मिली.
सजा का आंकड़ा कम होने के सवाल पर प्रोफेसर काचुरू कहते हैं कि ज्यादातर मामला स्टूडेंट के माफी मांगने और काउंसलिंग के बाद बंद कर दिया जाता है. सजा का प्रावधान केवल उन स्टूडेंट्स के लिए होता है जिन्होंने कोई गंभीर अपराध रैगिंग के दौरान किया हो.
टॉप फाइव स्टेट्स जहां पिछले 10 साल में सबसे ज्यादा रैगिंग के मामले सामने आए
1- उत्तर प्रदेश
2009 में 64, 2010 में 105, 2011 में 120, 2012 में 85, 2013 में 94, 2014 में 80, 2015 में 51, 2016 में 93, 2017 में 143, 2018 में 180, 2019 में 152, 2020 में अब तक 15 मामले समेत कुल 1182 मामले पिछले 10 सालों में दर्ज किए गए हैं
2- पश्चिम बंगाल
2009 में 43, 2010 में 54, 2011 में 89, 2012 में 38, 2013 में 81, 2014 में 54, 2015 में 53, 2016 में 50, 2017 में 99, 2018 में 119, 2019 में 112, और 2020 में अब तक 11 मामलों समेत कुल 803 मामले पिछले 10 सालों में दर्ज किए गए.
मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश रैगिंग के मामले में देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है यहां कुल 745 मामले 10 सालों में दर्ज हुए हैं जिसमें 2019 में ही 132 मामले दर्ज किए गए थे शिकायत दर्ज कराने वालों में 58 लड़कियों ने और 687 लड़कों ने साहस दिखाया था वर्ष वार अगर बात करें तो
2009 में 40, 2010 में 33, 2011 में 37, 2012 में 32, 2013 में 80, 2014 में 74, 2015 में 48, 2016 में 55, 2017 में 100, 2018 में 104, 2019 में 132 और 2020 में 10 मामलों समेत कुल 745 मामले दर्ज किए गए.
उड़ीसा
2009 में 36, 2010 में 41, 2011 में 54, 2012 में 44, 2013 में 71, 2014 में 32, 2015 में 30, 2016 में 28, 2017 में 46, 2018 में 61, 2019 में 80 और 2020 में 10 मामलों समेत कुल 533 मामले उड़ीसा में दर्ज किए गए.
बिहार
बिहार रैगिंग के मामले में बिहार देश का पांचवा सबसे बड़ा केंद्र है जहां पिछले 10 सालों में 372 मामले दर्ज किए गए. वर्ष वार अगर बात करें तो
2009 में 10, 2010 में 15, 2011 में 27, 2012 में 27, 2013 में 33, 2014 में 39, 2015 में 21, 2016 में 24, 2017 में 53, 2018 में 57, 2019 में 7 और 2020 में अब तक 6 मामलों समेत कुल 372 मामले पिछले 10 वर्षों में बिहार में दर्ज किए गए हैं.
एंटी रैगिंग का विश्वास दिलाने वाले कॉलेजों में रैगिंग के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. इस सवाल के जवाब में एक दैनिक समाचार पत्र से चर्चा करते हुए रैगिंग मॉनेटरी की तरह काम करने वाले अमन मूवमेंट एनजीओ के फाउंडर प्रोफेसर राज काचुरू ने बताया कि अब ऐसे मामलों को दर्ज कराने के लिए पेरेंट्स और स्टूडेंट में विश्वास बढ़ा है. यही कारण है कि अब मामले ज्यादा दिखाई दे रहे हैं. उन्होंने भरोसा भी जताया है कि आने वाले भविष्य में रैगिंग पर पूरी तरह से रोक लगेगी. बता दे 2009 में राज काचुरू के बेटे मेडिकल छात्र अमन सत्या ने रैगिंग से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी.राज काचूरू ने रैगिंग के खिलाफ आंदोलन चलाया और उस आंदोलन का नाम अमन मूवमेंट रखा. राज काचूरू के बेटे की मौत पर संज्ञान लेते हुए यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन ने एंटी रैगिंग हेल्पलाइन की शुरूआत की थी और अमन मूवमेंट के साथ मिलकर पहले कंपेन किया और फिर गाइडलाइन जारी की. राज कहते हैं कि उनका उद्देश्य डर का माहौल बनाना नहीं बल्कि डर को निकालना है.
( सभी आंकड़े यूजीसी पोर्टल से 22 फ़रवरी2020 तक के आधार पर)


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