सहारनपुर. कभी-कभी आमजन के फायदे के लिए जारी शासनादेश माफिया और तस्करों के लिए बेहद मुफीद साबित होते हैं. फलदार पेड़ों को काटे जाने की अनुमति देने का अधिकार जब से वन विभाग के पास आया है इन पेड़ों की शामत आ गई है. कुछ पेड़ों को काटने की अनुमति देकर हरे भरे बाग जमीदोंज किये जा रहे हैं. करीब डेढ़ माह में वन विभाग की मौन अनुमति से वन तस्करों ने सैंकड़ों पेड़ों पर आरियां चला दी हैं.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में 5 जुलाई को 25 करोड़ पौधे एक साथ रोपित करवाकर प्रकृति को हरा भरा ऑक्सीजन युक्त बनाने के मकसद से अभियान चलाया था. जिसको बाकायदा वन महोत्सव का नाम भी दिया गया.
इधर सरकार पौधारोपण करा रही थी उधर वन तस्कर वन विभाग की मौन सहमति से वृक्षों के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर रहे थे. हौसले इतने बुलंद कि तस्करों ने बागों से ना केवल वृक्षों को काटा बल्कि उनकी जड़ो को भी उखाड़ कर बाग के बाग को प्लेन करने का काम कर दिया और यह सब हो सका वन विभाग की सहमति से.
दरअसल वन विभाग के रेंजर डिप्टी रेंजर इस खेल के सबसे बड़े खिलाड़ी होते हैं जिनकी सहमति के बाद वन तस्करों के हौसले बुलंद होते हैं और हरे-भरे बागों पर आरी चलाते हुए उनके हाथ नहीं कांपते हैं.
क्या है मामला
दरअसल, जिस समय सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ वृक्षारोपण के अभियान का आगाज करने के लिए निर्देशित कर रहे थे उसी अभियान की तारीख से तकरीबन एक हफ्ता पहले मोहंड रेंज में डिप्टी रेंजर, रेंजर की सहमति से वन तस्कर ने पूरे बाग को मैदान बना दिया. तस्कर का हौसला इतना बुलंद था कि उसने बकायदा हरे भरे आम के पेड़ों को काटते हुए उनकी ढूंढो तक को बाहर निकाल दिया ताकि कोई सबूत बाहर ना आ सके. इस संबंध में जब रेंजर और डिप्टी रेंजर से संपर्क किया गया तो एक गोलमोल जवाब निकल कर सामने आया.
नियम तो यह कहता है
इस संबंध में जब रेंजर से संपर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि हरे-भरे पेड़ों को नहीं काटा जा सकता. फलदार वृक्षों को काटने की अनुमति नहीं होती है. यदि पेड़ों में कोई रोग आ जाता है तो ऐसी स्थिति में वन विभाग से परमिशन लेनी होती है जो उनके द्वारा नहीं दी गई है. ऐसे में उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि पेड़ अवैध कटे हैं लेकिन उन पर कार्रवाई के नाम पर रेंजर मोनी बाबा बन गए. इतना ही नहीं डिप्टी रेंजर ने भी पूरे मामले से अनभिज्ञता जताई जो अपने आप में हैरान करने वाली बात है.
वन विभाग को लेकर बवाल क्यों है
दरअसल पूरे मामले में रेंजर और डिप्टी रेंजर समेत विभाग की भूमिका संदिग्ध है. वजह स्पष्ट है क्योंकि जब रेंजर से बात की गई तो उन्होंने बताया कि डिप्टी रेंजर ने उनको मामले की जानकारी दी है. लेकिन डिप्टी रेंजर से जब इस संबंध में बात की गई तो उन्होंने स्पष्ट मना किया कि मुझे कोई जानकारी नहीं है. यह अपने आप में हैरान करने वाली बात है क्योंकि पेड़ों का कटान करने वाले तस्कर ने पांच पेड़ काटने की बात को स्वीकार किया है जबकि पूरे सप्ताह हरे भरे पेड़ो का कटान जारी रहा. सबसे दिलचस्प मामला तब हो जाता है जब जिला वन अधिकारी को संपर्क साधने की कोशिश की जाती है और उनके द्वारा पूरे मामले में कोई दिलचस्पी नहीं ली जाती है.
माफिया परमिट की आड़ में सैकड़ों पेड़ों पर आरियां चला रहे हैं. रातोंरात अवैध तरीके से पेड़ कट रहे हैं लेकिन वन विभाग के अधिकारी मौके पर जाने की जरूरत तक नहीं समझ रहे. अवैध पातन का मामला तो वन विभाग के संज्ञान में आ चुका है. इनके अलावा न जाने ऐसे कितने पेड़ कट गए होंगे जो संज्ञान में नहीं आए अथवा जिनका संज्ञान लेना भी इन्होंने जरूरी नहीं समझा.
ऐसे में सवाल है कि सरकार की हरे भरे फलदार वृक्षों से संपन्न धरती का सपना साकार कैसे होगा. जब सरकार की नाक के नीचे उनकी मिशन को मट्टी लगाने वाले अधिकारी और कर्मचारी बैठे हैं.



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