कोविड-19 महामारी के बीच स्कूलों को 19 अक्टूबर खोल दिया गया. केंद्र सरकार के निर्देश के बाद कक्षा के स्कूलों को शशर्त खोलने की घोषणा राज्य सरकारों के बाद जिला प्रशासन ने भी कर दी है. स्कूलों में ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों तरह की कक्षाओं को जारी किया गया है. कक्षा में दो-दो घंटे की पालियां लगाई जा रही है. इसी बीच अभिभावकों को मिले लेटर में उनकी परेशानी बढ़ा दी है. कई जगहों पर स्कूलों की ओर से बच्चों के घर पत्र भेजे गए हैं जिसमें प्रबंधकों ने बच्चों के माता-पिता से 5 बिंदुओं पर सहमति मांगी है. स्कूल प्रबंधकों की ओर से सहमति देने के बाद ही स्कूल में प्रवेश की अनुमति देने की बात कही गई है.
कहा गया है कि अभिभावक सहमत हैं तो साइन करके उस लेटर को स्कूल भेज दें और असहमति की स्थिति में बच्चों को स्कूल ना भेजें.
स्कूलों ने अभिभावकों से इन पांच बिंदुओं पर सहमति मांगी
1-बच्चा हैंड सैनिटाइजर, पानी की बोतल और खाना घर से लेकर आएगा.
2-बच्चा बिना मास्क के घर से नहीं आएगा.
3-स्कूल को इजाजत होगी कि वह बच्चे की थर्मल चेकअप कर सकें.
4-बच्चे के स्वास्थ्य की जानकारी मां-बाप गोपनीय नहीं रखेंगे.
5-अभिभावकों को सहमति देनी होगी कि हम अपने बच्चों को भौतिक रूप से स्कूल भेजेंगे और उनकी हेल्थ की जिम्मेदारी पूरी तरह से हमारी होगी.
उत्तराखंड में स्कूलों के क्या हाल है हालात
देवभूमि उत्तराखंड स्कूल 1 नवंबर से फिर से खुलेंगे. अभिभावकों में असुरक्षा का भाव देखा जा रहा है. राज्य में बढ़ते कोविड-19 के मामले के बीच में स्कूल प्रबंधकों ने कोविड-19 प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन कर कक्षाओं को शुरू करने के लिए सहमति जताई है. स्कूल 50% उपस्थिति को तैयार हैं लेकिन इसके बावजूद छात्र संक्रमित हो जाए ऐसी स्थिति में स्कूल जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है. यही कारण है कि अभिभावकों में बच्चों को स्कूल भेजने और ना भेजने को लेकर दुविधा की स्थिति बनी हुई है.
स्कूलों में उपस्थिति ना के बराबर
हालांकि कक्षा 9 से 12 तक के स्कूलों को सरकार ने खोल दिया है बावजूद इसके शहरी क्षेत्रों में 5 से 10% बच्चे ही बमुश्किल स्कूलों में पहुंच रहे हैं जबकि देहात क्षेत्रों में थोड़ी संख्या अधिक बताई जाती है. इसके पीछे अभिभावकों का डर सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है.

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