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ग़लत गिरफ्तारी पर मुवावजे का है नियम, जानिए कानून से जुड़े अपने अधिकार को

प्रतीकात्मक तस्वीर

पुलिस के द्वारा गलत तरीके से गिरफ्तारी पर मुआवजे का नियम है. मुआवजा कैसे मांग सकते हैं? इस पर नियम क्या कहता है? इस सवाल के जवाब के लिए बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद एनसीबी की कार्रवाई को आधार बनाकर समझने की कोशिश करते हैं. दरअसल पूरे मामले में सुशांत के सहयोगी रहे दीपेश सावंत समेत 23 लोगों की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं. दीपेश फिलवक्त जमानत पर हैं. दीपेश ने मुंबई हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर NCB( नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो) पर अवैध रूप से हिरासत में रखने का आरोप लगाते हुए ₹10 लाख का मुआवजा मांगा है. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कानून के कौन से प्रावधान के तहत मुआवजे की मांग की जा सकती है.

दीपेश की गिरफ्तारी की प्रमुख बातें

दिवंगत बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के सहयोगी दीपेश सावंत को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने एनडीपीएस एक्ट, 1985 की धारा 20 बी, 23, 29 और 30 के तहत गिरफ्तार किया था. दीपेश ने अपने गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है. दीपेश ने आरोप लगाया है कि 4 सितंबर की रात 10:00 बजे उसे गिरफ्तार किया गया लेकिन गिरफ्तारी को 5 सितंबर की रात 8:00 बजे दिखाया गया. 6 सितंबर की दोपहर 1:30 बजे कोर्ट में पेश किया गया. दीपेश ने आरोप लगाया कि एनसीबी ने 36 घंटे हिरासत में रखने के बाद उसे मजिस्ट्रेट के यहां पेश किया. दीपेश के वकील राजेंद्र राठौर ने एनसीबी के आचरण को संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 यानी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है.

क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 21 और 22

संविधान का अनुच्छेद 21- अनुच्छेद 21 मौलिक अधिकार को परिभाषित करता है. इसके मुताबिक किसी व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. यह कानून हर किसी को जीवन जीने का अधिकार देता है.

अनुच्छेद 22- कानून का आर्टिकल 22 यह प्रावधान करता है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए. इतना ही नहीं गिरफ्तारी से पहले इसका कारण भी बताना जरूरी होता है.

गिरफ्तारी क्या होती है?

किसी ऐसे व्यक्ति को पकड़ना जिसने अपराध किया हो या उसके जरिए अपराध होने की संभावना हो इसे ही गिरफ्तारी कहते हैं. गिरफ्तारी में यह देखना जरूरी है कि अपराध किस तरह का है. मतलब अपराध संज्ञेय है या असंज्ञेय यानी अपराध जानबूझकर हुआ है या अनजाने में. इसी के द्वारा पता लगाया जाता है कि अपराध जमानती है या फिर गैर जमानती जमानती. जमानती अपराध को अक्सर थाने में ही जमानत मिल जाती है लेकिन गैर जमानती अपराधों में जमानत का फैसला अदालत तय करती हैं. गिरफ्तारी के दौरान गिरफ्तार शख्स के कई अधिकार सस्पेंड हो जाते हैं.

गिरफ्तारी कितने तरीके से हो सकती है

किसी भी अपराध में 3 तरीके से गिरफ्तारी बताई गई है जिसमें

प्रीवेंटिव अरेस्ट- इस तरह की गिरफ्तारी में अपराध होने के बाद या अपराध होने की आशंका पर पुलिस सीधे गिरफ्तार कर सकती है. इसके लिए क्रिमिनल प्रोसीजर कोड यानी सीआरपीसी की धारा- 151 (1) में बिना वारंट अरेस्ट करने के अधिकार दिए गए हैं.

किसी की शिकायत पर गिरफ्तारी- किसी अपराध की शिकायत मिलने पर पुलिस किसी को अरेस्ट कर सकती है जिसमें 7 साल या उससे अधिक की सजा का नियम होता है. सीआरपीसी की धारा 41 में इस बात का प्रावधान है.

वारंट पर गिरफ्तारी- यदि किसी को गिरफ्तार करने के लिए कोर्ट कोर्ट ने अरेस्ट वारंट जारी किया है तो पुलिस उसे अरेस्ट कर सकती है. इतना ही नहीं उसकी प्रॉपर्टी की तलाशी ले सकती है और जरूरत पड़ने पर कुर्की की कार्रवाई भी कर सकती है.

24 घंटे पुलिस हिरासत पर कानून पक्ष क्या है?

एक बड़ा सवाल अक्सर चर्चा में रहता है कि क्या 24 घंटे से भी अधिक समय तक किसी व्यक्ति को हिरासत में पुलिस रख सकती है? इस सवाल का कानून जवाब हां है. मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद पुलिस चाहे तो किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रख सकती है.

गिरफ्तारी और हिरासत क्या होता है?

दरअसल गिरफ्तारी और हिरासत व्यक्ति के पर लगाए गए चार्ज पर निर्भर करता है. मान लीजिए पुलिस ने शक के आधार पर किसी को पकड़ा है आरोप नहीं लगाए हैं तो ऐसे में पूछताछ के बाद पुलिस उसको छोड़ सकती है इसे हिरासत भी कहा जाता है. लेकिन गिरफ्तारी में आरोप लगाए जाने के बाद ही पुलिस कार्रवाई करती है. हिरासत के भी दो पक्ष पहला पुलिस हिरासत और दूसरा न्यायिक हिरासत.

न्यायिक हिरासत-इसके तहत आरोपी को मजिस्ट्रेट के आदेश पर जेल में रखा जाता है.

पुलिस हिरासत-किसी व्यक्ति के खिलाफ सूचना या शिकायत या शक होता है तो पुलिस उसे गिरफ्तार करके हवालात में रखती है. इसे पुलिस हिरासत कहते हैं. सबसे खास बात यह है कि पुलिस हिरासत के समय आरोपी को जेल में नहीं बल्कि थाने में रखा जाता है. किसी सच को उगलवाने के लिए या जांच की कड़ियों को जोड़ने के लिए पुलिस मजिस्ट्रेट से एक बार में 15 दिन की कस्टडी मांग सकती है.

देश की अखंडता या सुरक्षा से मामला जुड़ा होने और केस के अनलॉफुल एक्टिविटीज एक्ट यूएपीए कानून 1967 के मामलों में सख्ती बढ़ जाती है. इसके तहत जांच एजेंसी या बिना वारंट किसी को भी हिरासत में ले सकती हैं. पुलिस कस्टडी 30 दिन और न्यायिक हिरासत 90 दिन तक की हो सकती है. ऐसे मामलों में जमानत लेने में काफी मुश्किल होती है.

गिरफ्तार व्यक्ति को कौन से अधिकार हैं?

  • सीआरपीसी की धारा 50 ए के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह इसकी जानकारी अपने परिवार या रिश्तेदार को दे सके.
  • सीआरपीसी की धारा 41 (D) के मुताबिक गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस जांच के दौरान अपने वकील से मिलने का अधिकार दिया गया है. वह अपने रिश्तेदारों से भी बातचीत कर सकता है.
  • ऐसी परिस्थितियां जहां गिरफ्तार व्यक्ति गरीब हो, उसके पास वकील रखने के लिए पैसा ना हो तो ऐसे व्यक्ति के लिए कोर्ट निशुल्क वकील मुहैया कराता है.

पुलिस ने गिरफ्तार किया है और कोर्ट भी नही ले जा रही तब क्या करें ?

किसी व्यक्ति को गलत तरीके से गिरफ्तार किया गया हो. हिरासत में गलत तरीके से रखा गया हो और 24 घंटे के भीतर कोर्ट में पेश नहीं किया गया हो तो वह व्यक्ति या उससे संबंधित कोई करीबी कोर्ट में “हैबियस कार्पस” की याचिका डाल सकता है. संविधान के अनुच्छेद -226 “हैबीयस कार्पस”की व्याख्या करता है. उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय इन याचिकाओं को प्राथमिकता के आधार पर सुनते हैं. दोषियों को दंड पर पीड़ित को मुआवजे का प्रावधान भी यह कानून देता है.

मुआवजा कैसे मांगा जाता है?

अवैध गिरफ्तारी की स्थिति में रिहाई के साथ-साथ मुआवजे की मांग पीड़ित कर सकता है. सीआरपीसी की धारा- 357 के तहत व्यक्ति न्यायालय में मुआवजे के लिए आवेदन कर सकता है. इसी कानून के आधार पर सुशांत सिंह राजपूत के सहायक दीपेश ने एनसीबी से 10 लाख रुपए के रूप में मुआवजे की मांग की है.

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Prakash Pandey

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