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यूपी सरकार को बेदखल कर राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका, प्रधान न्यायाधीश ने कही बड़ी बात

Cm of up Yogi Adityanath

उत्तर प्रदेश में बढ़ते अपराध का ग्राफ लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई और कहा गया कि सरकार अपराधियों पर नियंत्रण में नाकाम हुई है. इस लिहाज से उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए. मामले पर सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई की और याचिका को खारिज करते हुए उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को बड़ी राहत दी.

याचिकाकर्ता ने क्या दी दलील

सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता इन पर्सन वकील सीआर जय सुकिन ने पीआईएल दाखिल कर कहा था कि उत्तर प्रदेश में अपराध दर बढ़ गई है और संविधानिक मशीनरी भी टूट चुकी है. याचिका में सुकिन ने उत्तर प्रदेश में सबसे खराब क्राइम रिकॉर्ड का दावा भी किया. उन्होंने पीआईएल में 2020 में जारी एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला दिया और कहा, उत्तर प्रदेश में हर 2 घंटे में दुष्कर्म का मामला दर्ज किया जाता है जबकि राज्य में हर 90 मिनट में एक बच्चे के खिलाफ अपराध दर्ज किया जाता है.

सर्वोच्च न्यायालय में क्या क्या हुआ

दलील सुनने के बाद प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे के अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता से सवाल किया और पूछा आपने कितने राज्यों के अपराध रिकॉर्ड का अध्ययन किया है. पीठ ने याचिकाकर्ता इन पर्सन वकील सीआर जय सुकिन को चेतावनी दे डाली और कहा कि वह याचिका की प्रवृत्ति को देखते हुए उन पर भारी जुर्माना लगा सकते हैं.

सुकून की ओर से दलीलें सुनने के लिए लगातार की जा रही कोशिशों से नाराज प्रधान न्यायाधीश वोबड़े ने कहा, क्या आपने अन्य राज्यों के अपराध रिकार्ड का अध्ययन किया है? रिसर्च कहां है? इस पर सुकिन ने राष्ट्रीय आंकड़ों की तुलना में उत्तर प्रदेश में 30% अपराध होने की दलील रखी.

सुकिन ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों का हवाला दिया और रिसर्च की बात कहते हुए कोर्ट को बताया कि उत्तर प्रदेश में अपराध का ग्राफ बढ़ गया है. इस पर पीठ में सुकीन से कहा, हमें बताएं कि आप इसे किस आधार पर कह रहे हैं. इसके बाद पीठ ने राष्ट्रपति शासन लगाने की दलील को खारिज कर दिया.

क्या कहा प्रधान न्यायाधीश ने

याचिका पर संक्षिप्त सुनवाई करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे ने कहा

याचिकाकर्ता के पास अपने दावों का समर्थन करने के लिए कोई रिसर्च नहीं है और वह यह स्थापित करने में विफल रहे हैं कि उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है. शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता से कहा कि ज्यादा बहस करेंगे तो भारी जुर्माना लगाएंगे.

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Prakash Pandey

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