उत्तराखंड. चमोली जिले के जोशीमठ में ग्लेशियर की टूट की गूंज उत्तराखंड से लेकर बिहार तक और दुनिया के कई देशों तक पहुंच गई. गनीमत रही कि बारिश नहीं हुई. इसलिए 2013 की भयावह तस्वीर की पुनरावृति नहीं हुई. ग्लेशियर टूट जाने से धौलीगंगा नदी में आई बाढ़ के चलते डेढ़ सौ से ऊपर लोग लापता हो गए जिनमें आठ के शव बरामद कर लिए गए जबकि 16 को बचा लिया गया है.
ग्लेशियर टूटने की खबर मिलते ही केंद्र सरकार और राज्य सरकार हरकत में आई. मौसम साफ होने के चलते राहत कार्य तेजी से हो सका. जल स्तर के कम होने से खतरा भी टल गया लेकिन 8 साल पहले केदारनाथ त्रासदी फिर से जेहन में ताजा हो गई.
साफ आसमान के चलते हेलीकॉप्टर उड़ान भरते रहे. एनडीआरएफ की टीम मौके पर पहुंच गई और बचाव अभियान भी शुरू कर दिया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत से लगातार संपर्क में है और राज्य को हर मुमकिन मदद का भरोसा दिला रहे हैं.
ग्लेशियर टूटने के पीछे कारण क्या है, जो वैज्ञानिकों के डर का कारण बन गया
आपने दोपहर से अब तक ग्लेशियर टूटने से लेकर नुकसान तक और बचाव से लेकर बहाव तक कई जानकारियां ले ली लेकिन सवाल यह है कि आखिर ग्लेशियर टूटने का कारण क्या है?
तो जान लीजिए कि एक बार फिर हिमालय में ग्लेशियर के पिघलने पर चर्चाएं तेज हो गई हैं. तापमान में वृद्धि को कारण मानते हुए वैज्ञानिकों ने कहा है कि 21वीं सदी की शुरुआत के बाद से ही हिमालय के हिमखंड यानी ग्लेशियर दोगुनी तेजी से पिघल रहे हैं.
वैज्ञानिकों ने चेताया है कि ग्लेशियर पिघलने से भारत समेत विभिन्न देशों के करोड़ों लोगों को जलापूर्ति प्रभावित होने का सामना करना पड़ सकता है. 2019 में एक अध्ययन के जरिए यह जानकारी सामने आई थी. अध्ययनकर्ताओं ने भारत, चीन, नेपाल और भूटान में 40 सालों के दौरान की सेटेलाइट तस्वीरों को देखा और परिणाम के रूप में में जलवायु परिवर्तन के चलते हिमालय हिमखंड समाप्ति का आकलन दिया.
जून 2019 के साइंस एडवांस जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक हिमालय के हिमखंड वर्ष 2000 के बाद से वर्ष 1975 से 2000 की तुलना में दोगुनी तेजी से पिघल रहे हैं.
अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में शोध उम्मीदवार जोशुआ मोरेन ने कहा
यह तस्वीर बिल्कुल स्पष्ट है कि इस समयावधि में कितनी तेजी से और क्यों हिमालय के हिमखंड पिघल रहे हैं.
मोरेल ने आगे कहा
हालांकि अध्ययन में यह सटीक गणना नहीं की गई है लेकिन पिछले चार दशकों में भूखंडों ने अपने विशाल द्रव्यमान का एक चौथाई हिस्सा को दिया है.
कुल मिलाकर अध्ययनकर्ताओं ने बढ़ते तापमान को ऐसी घटनाओं का जिम्मेदार ठहराया और कहा कि अलग-अलग स्थान का तापमान भिन्न है लेकिन यह 1975 से 2000 की तुलना में वर्ष 2000 से 2016 के बीच औसतन 1 डिग्री अधिक पाया गया है.
अब उत्तराखंड की उन आपदाओं को जान लीजिए जिनकी याद भी दिल दहला देती है
- उत्तराखंड के लोग इससे पहले भी केदारनाथ त्रासदी (16 जून 2013) झेल चुके है. कई लोगों ने इस हादसे में अपनी जान गंवाई थी और कई गायब लोगों की तलाश नहीं हो पायी थी. करीब 4000 से अधिक गांवों का संपर्क टूट गया था. केदारनाथ त्रासदी के दौरान सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और आइटीबीपी की टीमों ने महाअभियान चलाकर यात्रा मार्ग में फंसे नब्बे हजार यात्रियों और तीस हजार से ज्यादा लोगों का बचाया गया था.
- साल 2020 में पिथौरागढ़ में चैसर गांव में एक मकान ढह गया. घटना सुबह हुई थी, इस कारण लोगों को बचने का मौका नहीं मिल पाया था.
- अगस्त 2019 में उत्तरकाशी जिले के मोरी तहसील में बारिश से उफनाए नालों की वजह से करीब दो सौ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था और करीब आधे दर्जन लोगों की जान गयी थी.
- साल 1999 में चमोली जिले में आए 6.8 तीव्रता के भूकंप ने 100 से अधिक लोगों की जान चली गयी थी. वहीं, पड़ोसी जिले रुद्रप्रयाग में भारी नुकसान हुआ था. भूकंप के चलते सड़कों एवं जमीन में दरारें आ गई थीं.
- साल 1998 में पिथौरागढ़ जिले का छोटा सा गांव माल्पा भूस्खलन के चलते बर्बाद हुआ था. हादसे में 55 कैलाश मानसरोवर श्रद्धालुओं समेत करीब 255 लोगों की मोत हुई थी. भूस्खलन से गिरे मलबे के चलते शारदा नदी बाधित हो गई थी.
- 1991 में आए भूकंप की वजह से उत्तरकाशी में चट्टानें कमजोर हो गई थीं. जिसके बाद ज्यादा बारिश के कारण चट्टानें जगह-जगह से दरक गयी थीं.
- उत्तरकाशी आराकोट में साल 2019 में आए आपदा से इलाके का लगभग 70 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र प्रभावित हुआ था. वहीं, कई इलाकों में संपर्क से लेकर जलसंकट तक गहरा गया था.

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