सहारनपुर. जिलाधिकारी अखिलेश सिंह किसानों को जागरूक करने के लिए और पराली पर प्रबंधन के लिए नया फरमान जारी किया है. उन्होंने जिला विद्यालय निरीक्षक को सरकारी, अर्द्धसरकारी और प्राइवेट विद्यालयों द्वारा चलाई जा रही ऑनलाइन कक्षाओं में पहले 5 मिनट पराली प्रबन्धन से होने वाले फायदे और नुकसान के बारे में विद्यार्थियों को जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं.
जिलाधिकारी अखिलेश सिंह ने बताया कि खेतों में फसल के अवशेष प्रबन्धन से मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढती है जिसके कारण मिट्टी की भौतिक गुणों में सुधार होता है और किसान की उत्पादन एवं उत्पादकता की वृद्धि के रूप में परिलक्षित करता है. उन्होंने कहा कि मृदा की जल धारण क्षमता बढने के साथ-साथ मृदा में वायु संचार भी बढता है. कार्बनिक पदार्थ बढने से पोषक तत्व की उपलब्धता भी बढती है जिसमें रासायनिक उर्वरक की आवश्यकता कम पडती है एवं किसानों की लागत कम होती है.
जिलाधिकारी ने कहा कि फसल अवशेष प्रबन्धन से पर्यावरण प्रदूषण भी नही होता है जिससे वायु भी प्रदूषित नही होती है एवं हमारा स्वास्थ्य भी उत्तम रहता है. उन्होंने कहा कि फसल अवशेष जलाने भूमि को मिलने वाले पोषक तत्व से वंचित रह जाती है. फसल अवशेष जलाने के फलस्वरूप मृदा का तापमान बढने के कारण जमीन की ऊपरी सतह पर रहने वाले मित्र कीट व केंचुए आदि नष्ट हो जाते है.
अखिलेश सिंह ने अवशेष जलाने से ग्लोबल वार्मिंग को बढावा मिलता है जिसके फलस्वरूप बाढ, सूखा, भूस्खलन जैसी परिस्थितियां उत्पन्न होती है. फसल अवशेष जलाने से उत्पन्न जहरीली गैसों के कारण सामान्य वायु की गुणवत्ता में कमी होती है, जिससे आंखों में जलन एवं त्वचा रोग तथा सूक्ष्म कणों के कारण जीर्ण हृदय एवं फेफडों की बीमारी के रूप में मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है.
कितनी मात्रा में पराली जलाने से कितना नुकसान
एक टन (1000 किग्रा) धान का फसल अवशेष जलाने से लगभग 5.5 किग्रा नाईट्रोजन (12 किग्रा यूरिया), 2.3 किग्रा फासफोरस आक्साईड (14 किग्रा सिंगल सुपर फास्फेट), 25 किग्रा पोटेशियम आक्साईड (40 किग्रा म्यूरेट आफ पोटास), 1.2 किग्रा सल्फर व धान के शोषित 50-70 प्रतिशत सूक्ष्म पोषक तत्व एवं 400 किग्रा कार्बन की हानि होती है. पोषक तत्वों के नष्ट होने के अतिरिक्त मिट्टी के कुछ गुण जैसे भूमि का तापमान, पी.एच., नमी, उपलब्ध फासफोरस एवं जैविक पदार्थों पर भी विपरीत प्रभाव पडता है.
पराली जलाना है दंडनीय
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम की धारा-24 एवं 26 के अन्तर्गत खेत में फसल अवशेष जलाया जाना एक दण्डनीय अपराध है. पर्यावरण क्षतिपूर्ति के लिए 02 एकड से कम क्षेत्र के लिए 2500 रूपये प्रति घटना, 02 से 05 एकड के लिये 5000 रूपये प्रति घटना, 05 एकड से अधिक क्षेत्र के लिये 15000 रूपये प्रति घटना. अपराध की पुनरावृत्ति करने पर कारावास एवं अर्थ दण्ड से दण्डित किया जाता है.

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