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OMG: देश में बेरोजगारी का हाहाकार, कुछ तो करो सरकार

नई दिल्ली. देश में बेरोजगारी एक बहुत बड़ी समस्या है जो दुर्भाग्य से मुद्दा नहीं बन पा रही है. पूरा देश सीएए और एनआरसी में उलझा हुआ है. देश की मीडिया टीवी डिबेट के जरिए टीआरपी बढ़ाने में लगी हुई है. सरकार और विपक्ष झगड़ रहे हैं लेकिन लेकिन सबसे बड़ी विडंबना देश की बेरोजगारी है, देश की आर्थिक सुस्ती है जो तमाम चर्चा के बीच जगह नही बना पा रही है.

देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने आर्थिक सुस्ती और स्लोडाउन से होने वाले नुकसान पर अपनी चिंता जाहिर की है.बकौल एसबीआई रिपोर्ट स्लोडाउन से इस साल तकरीबन 16 लाख लोगों को नौकरी नही मिल पाएगी. जो एक बहुत बड़ा आंकड़ा है. देश के युवाओं के लिए एक बहुत गंभीर मुद्दे के साथ-साथ बड़ी समस्या भी साबित होगी.

एसबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती से रोजगार सृजन बुरी तरह प्रभावित हुआ है. चालू वित्त वर्ष में नई नौकरियों के अवसर एक साल पहले की तुलना में 16 लाख कम सृजन होने का अनुमान है. एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट इकोरैप से यह जानकारी मिली है.

यह भी कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष 2019-20 में इससे पिछले वित्त वर्ष 2018-19 की तुलना में 16 लाख कम नौकरियों का सृजन होने का अनुमान है. पिछले वित्त वर्ष में कुल 89.7 लाख रोजगार के अवसर पैदा हुए थे.

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के आंकड़ों के अनुसार 2018-19 में 89.7 लाख नए रोजगार के अवसर उत्पन्न हुए थे. चालू वित्त वर्ष में इसमें 15.8 लाख की कमी आने का अनुमान है. ईपीएफओ के आंकड़े में मुख्य रूप से कम वेतन वाली नौकरियां शामिल होती हैं जिनमें वेतन की अधिकत सीमा 15,000 रुपये मासिक है.

रिपोर्ट में की गई गणना के अनुसार अप्रैल-अक्तूबर के दौरान शुद्ध रूप से ईपीएफओ के साथ 43.1 लाख नए अंशधारक जुड़े. सालाना आधार पर यह आंकड़ा 73.9 लाख बैठेगा.

सरकारी नौकरियों में भी कमी : ईपीएफओ में केंद्र और राज्य सरकार की नौकरियों और निजी काम-धंधे में लगे लोगों के आंकड़े शामिल नहीं है. 2004 से ये आंकड़े राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) के तहत स्थानांतरित कर दिए गए हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, रोजगार के एनपीएस की श्रेणी के आंकड़ों में भी राज्य और केंद्र सरकार में भी मौजूदा रुझानों के अनुसार 2018-19 की तुलना में चालू वित्त वर्ष में 39,000 कम अवसर श्रृजित होने का अनुमान है.

रिपोर्ट के अनुसार, निजी कंपनियों की ओर से श्रमिकों के वेतन में कम बढ़ोतरी भी चिंता का विषय है. इस कदम से अधिक कर्ज लेने की दर बढ़ने का खतरा है, जो अर्थव्यवस्था और वित्तीय तंत्र के लिए जोखिम पैदा कर सकता है.

मई, 2019 में केंद्र सरकार ने माना था कि भारत में बेरोजगारी दर 45 साल में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई और जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच बेरोजगारी 6.1 प्रतिशत थी। वहीं 7.8 प्रतिशत शहरी युवाओं के पास नौकरी नहीं थी.

उद्योगों में श्रमिकों की मांग भी घटी : रिपोर्ट के अनुसार, उद्योग जगत में छाई सुस्ती की वजह से नए श्रमिकों की मांग घटी है. कई कंपनियां दिवालिया प्रक्रिया का सामना कर रही हैं, जिनके समाधान में देरी की वजह से ठेके पर श्रमिकों की भर्ती में बड़ी गिरावट आई है.

यूपी-बिहार के श्रमिकों ने कम पैसे भेजे : रिपोर्ट के अनुसार असम, बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में नौकरी मजदूरी के लिए बाहर गए व्यक्तियों की ओर से घर भेजे जाने वाले धन में कमी आई है. यह दर्शाता है कि ठेका श्रमिकों की संख्या कम हुई है. इन राज्यों के लिए मजदूरी के लिए पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जाते हैं और वहां से घर पैसा भेजते रहते हैं.

आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में इन पैसों की औसत वृद्धि 9.4 से 9.9 प्रतिशत पर टिकी है.यह दर्शाता है कि श्रमिकों की वेतन वृद्धि काफी धीमी हो रही है. नए रोजगार में ज्यादा बढ़ोतरी भी नहीं हुई है.

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Prakash Pandey

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