देहरादून. अगर आप उत्तराखण्ड में रहते हैं तो यह ख़बर आपके काम की हो सकती है. यदि आप अपने को अधिक स्वतंत्र और क्रांतिकारी के रूप में देख रहे हैं तो भी यह आपके लिए जान लेना जरूरी है कि आपकी हद क्या है? और यह हद तय की है उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने. बिलकुल ठीक पढ़ा आपने. अब जब उत्तराखण्ड के वासियों ने पूर्ण बहुमत की सरकार उत्तराखण्ड में दी है तो सीएम साहब को भी अपनी वाली दिखाने की जरूरत तो है ही. फिर चाहे वो कोई आंदोलन को जमीन पर लाना हो या उच्च न्यायालय का आदेश. आप गर्व किजिए कि आपकी प्रचंड बहुमत वाली सरकार ने कल बड़ा कीर्तिमान अपने नाम किया है. जिसे सुनकर आप भी अभिभूत हो जाएंगे.
ये तो हुई सरकार की वाहवाही, अब सीधे मुद्दे पर आते हैं. दरअसल, उत्तराखण्ड में फीस वापसी को लेकर छात्र पिछले 18 दिनों से आंदोलनरत थे. फीस बढ़ाए जाने के खिलाफ़ नैनीताल हाईकोर्ट से अपने पक्ष में आदेश लेने के बाद भी कोई राहत मिलते न देख छात्रों ने लोकतंत्र में अपनी आवाज़ को रखने के माध्यम यानि आंदोलन का रास्ता पकड़ लिया. करीब 18 दिन तक आंदोलन कर सरकार को टेंशन देने वाले छात्रों को सरकार ने बताया कि उनको प्रचंड बहुमत है. फीस वापसी वाले हाईकोर्ट के आदेश की अंगुली पकड़ आंदोलन कर रहे आयुर्वेद कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों को शनिवार (19 अक्तूबर) को सरकारी गुमान का सामना करना पड़ा. सरकार के आदेश पर पुलिस ने बर्बरता से पीटकर न केवल छात्रों को उठा दिया बल्कि उनके आंदोलन को भी समाप्त कर दिया.
सूबे के मुखिया के इस कदम से निश्चित ही लोकतंत्र में उनका नाम और कद बढ़ गया होगा. छात्र-छात्राओं के साथ पुलिस के चीर परिचित अंदाज में गाली-गलौज और धक्का-मुक्की से अब कई दिनों तक सरकार चैन से राजपाट चला सकती है.
लगे हाथ आमजन को भी सरकारी ताकत का अंदाजा हो गया होगा. लोगों में तो यह भी चर्चा है कि जब नौजवान खून को शांत करने का हुनर सरकार में है तो बूढी हड्डियां कहां तक साहस करेंगी. माने कुल मिलाकर कहें तो फिलहाल हुकुमत की ताकत देख जल्दी कोई आंदोलन सामने आने वाला नहीं है. छात्रों की नादानी उन्हें भारी पड़ गई वो नहीं जान सके बहुमत से हुकुमत पाने वालों के लिए आदेश कुछ नहीं होते, हाईकोर्ट की नहीं सुनी जाती. ऐसी सरकारें हाईकोर्ट के नहीं बल्कि हाईकमान की सुनती हैं, और किसी की नहीं.
चलिए आंदोलन चल भी जाता लेकिन मंत्रियों के कॉलेजों के खिलाफ भी आंदोलन ऐसे थोडे न होता है. छात्रों ने भी पहाड़ से राड़ कर ली. इन कॉलेजों में एक कॉलेज तो स्वयं आयुर्वेदिक विभाग संभालने वाले कबीना मंत्री हरक सिंह रावत का ही है और एक कॉलेज केंद्रीय कबीना मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक का है. अब ऐसे में सवाल यह है कि छात्र किन राज्य विरोधियों के इशारे पर आंदोलन कर रहे थे.
छात्रों को पहले से विश्लेषण कर लेना चाहिए था कि यह कोई मिली जुली सरकार थोडे न है, पूर्ण बहुमत की सरकार है अपने हिसाब से चलती है, कोर्ट के हिसाब से नहीं. थोड़ा छात्रों को सरकार के बारे में जान लेना चाहिए था कि जब सरकार ने उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय के आदेश को दरकिनार कर राजमार्गों को जिलास्तरीय घोषित कर दिया था और मलिन बस्तियों से अतिक्रमण हटाने की हाईकोर्ट के आदेश को सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से ठेंगा दिखा दिया था. तो इनकी क्या बिसात थी?
कुल मिलाकर कहें तो छात्रों के साथ-साथ उनकेे अभिभावकों को भी यह समझ आ गया होगा कि सरकार सरकार होती है उसके लिए कोई आदेश मायने नहीं रखते हैं.


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