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व्यक्ति विशेष: राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित आईपीएस ने पुलिस सेवा को लेकर कह दी बड़ी बात जानिए क्या क्या कुछ बोले..

कानपुर/लखनऊ. इंडियन पुलिस सर्विस कोई नौकरी नहीं यह एक सेवा है जिसको मैं करता हूं. कानपुर के आईपीएस बेटे सूरज सिंह अपनी ड्यूटी को लेकर इन शब्दों को अपने जीवन में उतार चुके हैं. समाज मैं अपनी भूमिका को सुनिश्चित करते हुए कवि और लेखक रहे सूरज सिंह ने युवाओं को प्रेरित करने के लिए फिल्म तक का निर्माण कर दिया.” नई सुबह का सूरज” फिल्म निश्चित ही प्रेरणा प्रदान करने वाली है. कानपुर का यह लाल आज इंडियन पुलिस सर्विस की नाक हैं. आईपीएस सूरज सिंह नक्सलियों से होने वाले खतरों के बारे में लोगों को जागरूक करते हैं.
आज व्यक्ति विशेष के विशेषांक में हम आपसे जाजमऊ कानपुर के रहने वाले सूरज सिंह परिहार जो वर्तमान में छत्तीसगढ़ में आईपीएस अफसर के रूप में अपना योगदान दे रहे हैं, उनकी चर्चा करने जा रहे हैं.


आईपीएस सूरज सिंह परिहार ने अपने जीवन में आईपीएस की वर्दी पहनने के लिए बहुत कष्ट उठाए. क्रिएटिव लेखक और कविताएं लिखने से लेकर अनेक शौक रखने वाले सूरज की जिंदगी में कभी अंधेरा था. अपने जीवन की चुनौतियों से लड़कर देश सेवा के क्षेत्र में आईपीएस सूरज सिंह की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है. सूरज सिंह ने कॉल सेंटर में नौकरी कर आईपीएस जैसे चैलेंजिंग जॉब को हासिल किया. जौनपुरी दादा दादी के प्यार में पूरा बचपन बिताने वाले सूरज ने देशभक्ति और मानवता की कहानियों को खूब सुना. 10 साल की उम्र में उनके पिता कानपुर के जाजमऊ में शिफ्ट हो गए थे जहां उनका दाखिला एक हिंदी मीडियम स्कूल में कराया गया. पढ़ाई-लिखाई से लेकर कविता खेल और पेंटिंग करने में सूरज अव्वल थे. क्रिएटिव राइटिंग और कविता के लिए सन 2000 में तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायण के हाथों बाल श्री अवार्ड ग्रहण करने वाले सूरज ने सरस्वती विद्या मंदिर डिफेंस कॉलोनी से 75% अंकों के साथ दसवीं और 85% अंकों के साथ 12वीं की परीक्षा पास की थी. कानपुर से ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद आर्थिक हालात के चलते उन्हें एक कॉल सेंटर में नौकरी करनी पड़ी. सात राउंड में पास होने के बाद आठवें राउंड में फेल हो गए सूरज ने कंपनी मैनेजर से समय मांगा और जी जान से इंग्लिश बोलने के अपने फ्लुएंसी में सुधार किया. और फिर टेस्ट में अच्छे नंबरों से पास हुए.

सूरज का मकसद आईपीएस बनना था कॉल सेंटर में नौकरी के साथ-साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी करना चैलेंजिंग था. लेकिन वह कहते हैं की परिस्थितियां नौकरी छोड़ने को मंजूर नहीं कर रही थी बावजूद उसके 2 साल नौकरी करने के बाद उन्होंने कॉल सेंटर की नौकरी को त्याग दिया और सिविल सर्विसेज की तैयारी में लग गए. 6 महीने में पैसे खत्म हो गए, आर्थिक स्थिति को भांपते हुए उन्होंने 8 बैंकों में पीओ के लिए परीक्षा दी. सभी परीक्षा में उत्तीर्ण करने वाले सूरज ने स्टेट बैंक ऑफ महाराष्ट्र में ज्वाइन किया. 2008 से 2012 तक बैंक में पीओ की नौकरी के बाद सूरज का चयन 2012 में एसएससी सीजीएल की परीक्षा में हो गया. इसके बाद उन्होंने कस्टम और एक्साइज डिपार्टमेंट में इंस्पेक्टर की नौकरी की. लेकिन संघर्ष और तैयारी जारी रखी. जुनून आईपीएस बनने का जो था. पहले अटेम्प्ट में सलेक्शन ना होने के बावजूद सूरज निराश नहीं हुए. उन्होंने दूसरा अटेम्प्ट दिया लेकिन इंटरव्यू में फिर असफलता मिली. तीसरे अटेम्प्ट में ऑल इंडिया 189 रैंक के साथ 30 साल की उम्र में सूरज ने देश के सबसे सम्मानित एग्जाम सिविल सर्विसेज को पास कर लिया. इंडियन पुलिस एकेडमी में ट्रेनिंग के बाद उन्हें रायपुर का एसपी नियुक्त किया गया था. उनके काम को देखते हुए उन्हें प्रमोट कर उनका ट्रांसफर दंतेवाड़ा कर दिया गया. वही दंतेवाड़ा जो नक्सल से बहुत अधिक प्रभावित है. सूरज कहते हैं कि अपने सीनियर्स के सहयोग के साथ उन्होंने दंतेवाड़ा में कई नक्सलवादियों को पकड़ा है और उनसे करीब एक करोड़ से भी अधिक की रकम बरामद की है. व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सॉफ्ट एंड हार्ड पुलिस टेक्निक का सहारा सूरज को पसंद है. पूरी कहानी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कोई भी सपना इतना बड़ा नहीं होता कि उस उसको पूरा न किया जा सके. सपने को पूरा करने के लिए बस जागना होता है.

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Prakash Pandey

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