बोल वचन खास

विशेष: नमाजियों की बाट जोहते रहे ईदगाह, घरों में हुई इबादत

RAJAN SHARMA
वैसे तो कहा जाता है कि खुदा की इबादत का कोई निश्चित समय और स्थान नहीं होता पर जब बात किसी विशेष दिन और विशेष परंपरा की हो तब यह अपने आप में बहुत मायने रखता है ।हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई परंपराएं अपने आप में अति महत्वपूर्ण है क्योंकि यह परंपराएं ही जनमानस को एक दूसरे से जोड़ती हैं मानव सभ्यता के विकास क्रम में परंपराओं का अपना विशेष योगदान है यह परंपराएं ही हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देती है, और इसी परंपरा का एक सोपान ईद उल फितर के त्यौहार से जुड़ा हुआ है, ईद उल फितर यानी इस्लाम धर्म के अनुयायियों का सबसे बड़ा त्यौहार , पवित्र रमजान के एक महीने की कठिन इबादत के बाद मिलने वाला उसका परिणाम ईद के रूप में भी जाना जाता है, कहते हैं एज महीने की कठिन इबादत के बाद रोजेदारों को अल्लाह के द्वारा उनकी मनचाही मुराद देने का दिन होता है, इस दिन परंपरा के अनुसार सभी रोजेदार ईदगाह ( ईद की नमाज अदा करने के लिए एक निश्चित स्थान) पर इकट्ठा होकर इबादत करते हैं सैकड़ों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा अपने आप में अनूठी है। शायद आज से पहले कभी ऐसा हुआ हो कि ईद की नमाज घरों में रहकर पढ़ी गई हो लेकिन इस बार वैश्विक महामारी कोरोना के चलते हमारे देश सहित दुनिया के कई देशों में लोकडाउन होने के कारण नमाजियों द्वारा घर पर ही रह कर ईद की नमाज अदा की गई, जिससे परंपरागत ईदगाह सूने नजर आए कहते हैं जो कुछ होता है ऊपर वाले की मर्जी से ही होता है ,ख़ुदा की इस मर्जी को स्वीकारते हुए सभी रोजेदारों ने घरों में रहकर नमाज पढ़ी और अपनी इबादत में खुदा से यही गुहार लगाई कि आने वाले समय में कभी ऐसे हालात पैदा ना कि हमें घरों में रहकर बंद कमरों में इबादत करनी पड़े इबादत के दौरान सभी ने यही दुआ की कि दुनिया पर आए इस वबा (महामारी) रूपी संकट को जल्द से जल्द दूर कर मानव जाति को फिर से वही हंसता खेलता, वातावरण मिले।

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Prakash Pandey

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