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Special report: जिन्हें आप भैया समझ कर अपमानित कर देते हैं उनके पीछे के दर्द को समझिए, एक ऐसा राज्य जहां रोजी रोटी के लिए लोगों को करना पड़ता है पलायन

बिहार जहां के लोगों को आप बिहारी कहकर या फिर भइये कहकर अपमानित कर देते हैं या उनको योग्य स्थान नहीं देते हैं उनके पीछे एक दर्द छुपा हुआ है और वह दर्द है बेकारी का. आर्थिक स्थिति में सुधार के ना होने के कारण वहां के लोगों को विभिन्न राज्यों के शहरों में या फिर विकसित स्थानों में जाकर अपना गुजर-बसर करना पड़ता है. बिहार की इस बड़ी समस्या पर केंद्रित आज की खास स्टोरी…

पटना. बिहार जहां से बड़े-बड़े महापुरुष निकल कर सामने आए हैं उसी बिहार के आधे से अधिक घरों के लोगो को रोजी रोटी के लिये दूसरे शहरों और विकसित जगहों पर पलायन करना पड़ता है. यह खुलासा इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज (आइआइपीएस) ने अपने हाल के अध्ययन में किया है. रिपोर्ट के मुताबिक बिहार के अधिक से अधिक घरों के लोग कमाने के लिए देश के भीतर या बाहर अधिक विकसित स्थानों पर चले जाते हैं. इतना ही नहीं राज्य के अधिकतर परिवार बाहर कमाने वालों से मिलने वाली आर्थिक मदद पर निर्भर हैं.

बिहार में इस गंभीर मुद्दे पर आइआइपीएस द्वारा मध्य गंगा मैदान से पलायन के संबंध में अध्ययन करवाया गया था. इसकी रिपोर्ट को आइआइपीएस निदेशक केएस जेम्स और राज्य के शिक्षा मंत्री कृष्णंदन प्रसाद वर्मा ने संयुक्त रूप से जारी की है. सर्वेक्षण के लिए 36 गांवों और 2270 घरों को शामिल करके इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक आजीविका को चलाने के लिए बाहर जाने वालों में पुरुषों की भूमिका महत्वपूर्ण है. सारण, मुंगेर, दरभंगा, कोसी, तिरहुत और पूर्णिया वह स्थान हैं जहां से लंबे समय से लोग आजीविका के लिए बाहर का रास्ता अपनाते हैं. वहीं, खास अवसरों पर कोसी, तिरहुत और पूर्णिया के इलाकों के लोग राज्य से बाहर का रुख करते हैं.
बाहर जाने वालों में बड़ी संख्या में पिछड़ी जाति अनुसूचित जातिके लोग होते हैं. रिपोर्ट में अधिक संख्या भूमिहीन, एकल परिवार की मानी गयी है जो बिहार से बाहर कमाने जाते हैं. ऐसे लोगों की औसत आयु 32 वर्ष है.

महिलाओं को लेकर भी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

आजीविका कमाने के लिए बाहर का रुख करने वालों के घरों की 47 फीसदी महिलाएं साक्षर हैं और उनमें से 22 फीसदी मजदूरी के लिए काम करती हैं. इसमें भी रोचक यही है कि अधिकतर एकल परिवार की महिलाएं हैं. खास बात यह भी है कि इनमें से तीन चौथाई महिलाओं से उनके पुरुष मोबाइल से प्रतिदिन बात करते हैं. केवल 29 फीसदी महिलाएं स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं और 80 फीसदी महिलाओं के पास अपने बैंक खाते हैं.
ऐसी महिलाओं का मानना है कि पुरुषों को बाहर कमाने से उनके घर स्थिति में सुधार हुआ है. उनकी आर्थिक समृद्धि, लाइफस्टाइल सहित उनके बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. उनका कहना है कि यदि पुरुष बाहर नही जाएंगे तो वह सुविधाओं से बंचित रह जाएंगी.

अब बात करते हैं खास अवसरों पर बाहर कमाने जाने वालों की.ऐसे करीब 90 फीसदी लोग कुछ समय के लिए जाते हैं. बिहार से 31 फीसदी पंजाब और उत्तर प्रदेश से 27 फीसदी समय पर महाराष्ट्र चले जाते हैं. लगभग 46 फीसदी लोग महीने के अंत में पैसा कमाकर लौटते हैं, जबकि 48 फीसदी लोग अपना पैसा बैंक के माध्यम से भेजते हैं. जो परिवार की आजीविका का बड़ा साधन बनता है.

बाहर जाने से क्या हुआ बदलाव

रिपोर्ट का अध्ययन करें तो मालूम होगा कि 75 फीसदी प्रवासियों की वापसी के बाद उनकी पारिवारिक आय, पारिवारिक संबंध और सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ है. उनमें से 25 फीसदी फिर से पलायन करना चाहते हैं जबकि दो-तिहाई अपने बच्चों को रोजगार के लिए पलायन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.कुल मिलाकर कहें तो रोजगार के अवसरों में कमी लोगों के पलायन का कारण है और यही पलायन आजीविका का बड़ा स्रोत बना हुआ है.

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Prakash Pandey

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