पांडेयजी तो बोलेंगे पॉलिटिकल खास

पड़ताल: इस नेता ने बचा ली भाजपा की साख, नही तो दिल्ली में मिल रही थी 0 सीट

नई दिल्ली. देश की राजधानी और दिल्ली प्रदेश में चुनाव खत्म हो चुके हैं. 62 सीटों के साथ आम आदमी पार्टी ने फिर से अपनी ताकत का एहसास कराया तो 8 सीटों के साथ भाजपा को केवल संतोष करना पड़ा. शुरू से ही मैदान से बाहर रही कांग्रेस शून्य पर सिमट कर रह गई. यह जीरो विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के लिए भी थी लेकिन पार्टी के कद्दावर नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति के चलते पार्टी को 8 सीट मिल गई.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा करो या मरो की स्थिति में थी. पार्टी को अपनी साख बचाना भारी पड़ रहा था. भले ही पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी जीत का दावा कर रही थी लेकिन अंदरूनी रिपोर्ट को लेकर हार का एहसास पार्टी को शुरू से ही था.सूत्रों की माने तो पार्टी को एक भी सीट मिलती हुई दिखाई नहीं दे रही थी.अरविंद केजरीवाल विधानसभा चुनाव में पहले दिन से ही भारी पड़ रहे थे. चुनाव में पार्टी की निजी रिपोर्ट आने के बाद से पार्टी के कद्दावर नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बेचैन हो उठे और खुद चुनाव की कमान संभालने का निर्णय लिया. यह अमित शाह थे जिसकी वजह से चुनाव एक तरफा की बजाय मुकाबले का चुनाव लगने लगा. चर्चा शुरू हो गई कि आम आदमी पार्टी को वॉक ओवर देने वाली भाजपा अब मुकाबले का चुनाव लड़ रही है. ऐसे में सवाल यह भी उठा हार नजर आने के बाद भी अमित शाह चुनाव में क्यों कूदे और प्रचार में डोर टू डोर कन्विंसिंग से लेकर सभी तरीके अपना लिए.

शुष्क नदी में उतरे क्यों, उतरे थे तो डूबे क्यों

बोल बचन टीम ने मामले की तह तक जाने की कोशिश की. यह जानने की कोशिश की कि क्या वास्तव में भाजपा को दिल्ली विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिल रही थी? आखिर अमित शाह को चुनाव में आक्रामक प्रचार क्यों करना पड़ा? यह तमाम ऐसे सवाल थे जिनका जवाब आप तक पहुंचना जरूरी है. साथ ही विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के लिए भी यह विश्लेषण पढ़ने योग्य है. आपको बता दें की 21और 22 जनवरी की रात 2:30 बजे तक अमित शाह के घर पर बैठक चली. जिसमें पार्टी को मिलने वाले वोट शेयर और सीटों पर चर्चा की गई. पार्टी को अनुमान लगा कि 18% वोट ही दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिल रहा है जो पिछली बार से 32.19 परसेंट से तकरीबन आधा था. इसके साथ ही पार्टी को एक भी सीट नहीं मिलने का अनुमान था. इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव में मिले 56.86% वोट से तीन गुना कम वोट परसेंट मिलने से पार्टी की बेचैनी बढ़ गई. इसी दिन भाजपा ने उम्मीदवारों की आखिरी सूची जारी की और 3 सीटें सहयोगी दलों जेडीयू और लोक जनशक्ति पार्टी को दे दी. यहां यह जान लेना जरूरी है कि पार्टी अपने सिंबल पर ही सहयोगीयों को चुनाव लड़ाती है लेकिन पहली बार सहयोगी दल अपने-अपने सिंबल पर चुनाव लड़ रहे थे.

मैं योद्धा हूं, नतीजा जो भी हो लड़ूंगा

पार्टी की स्थिति को खराब जानकर बेचैन हुए अमित शाह ने दिल्ली विधानसभा चुनाव को पार्टी की साख से जोड़ दिया और नेताओं से कहा कि सीटों से ज्यादा वोट शेयर को बचाने की चुनौती है. शाह बहुत अच्छी तरह जानते थे कि यदि पार्टी का वोट शेयर डाउन हुआ तो उसकी तुलना भी कांग्रेस के साथ एक तराजू में की जाएगी. पार्टी के दिग्गज और रणनीतिकारों ने अमित शाह से हारी हुई लड़ाई में ना उतरने का निर्णय लेने के लिए कहा जिस पर अमित शाह ने अपने ही अंदाज में कहा, मैं योद्धा हूं नतीजा जो भी हो लडूंगा.

23 से शाह ने बढ़ाई प्रचार की रफ़्तार

22 जनवरी की बैठक के बाद से 23 जनवरी की सुबह ही अमित शाह ने अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया. शाह ने दिन में 3 से 5 पदयात्रा और जनसभाएं की. शाह ने गणतंत्र दिवस के दिन भी अपनी जनसभाओं का दौर रोका नहीं और इस दिन भी 3 जनसभाएं की. इतना ही नहीं 29 जनवरी की बीटिंग रिट्रीट में शिरकत ना कर जनसभाएं की.31 जनवरी को संकल्प पत्र घोषित करने का कार्य केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को सौंपा गया. शाह ने उस दिन चार सभाओं को संबोधित किया. दिल्ली चुनाव में अमित शाह ने 36 पदयात्रा और जनसभाएं की इतना ही नहीं अमित शाह ने डोर टू डोर कन्विंसिंंग भी की.

दिल्ली में होगा सांगठनिक बदलाव

अमित शाह के प्रयास से 8 सीट लेने में भाजपा कामयाब रही लेकिन पार्टी इस हार के मलाल से खुद को बचा नहीं पा रही है. यही कारण है कि पार्टी में लगातार बैठकों का सिलसिला चल रहा है. पार्टी इस बात पर संतोष कर रही है कि अमित शाह के चलते पार्टी का वोट शेयर होने से बचा लिया गया. लेकिन जिस तरह से पूरे चुनाव में नेताओं की जुबान फिसली और जमीनी स्तर पर कार्य करने में कमी रही उसको लेकर पार्टी गंभीर है. माना जा रहा है कि दिल्ली में नेतृत्व में बड़े बदलाव की तैयारी में पार्टी लगी हुई है.

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Prakash Pandey

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