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व्यथा: मुख्यमंत्री के मीडिया कॉर्डिनेटर को वरिष्ठ पत्रकार योगेश भट्ट का जवाब, बोले कथित हूं, पर व्यथित हूं

देहरादून/उत्तराखंड. हां मैं व्यथित हूं, व्यथित इसलएि नहीं कि मुख्यमंत्री के मीडिया कोर्डिनेटर दर्शन सिंह रावत मुझे राज्य हित में लिखने पर कथित पत्रकार कह रहे हैं, व्यथित इसलिए हूं कि मैं और मुझ जैसे अनगिनत लोग आज समाज में अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर सकते. व्यथित इसलिए भी हूं कि संस्थागत और पेशागत सम्मान, सुचिता, मर्यादाएं खत्म हो चुकी हैं. व्यथित इसलिए भी हूं कि लगभग एक दशक तक जिस राज्य को पाने के संघर्ष में आहुति दी, आज उसी राज्य की अपेक्षाओं की बात करने और भविष्य पर चिंता जताने को ‘दुर्भावना’ बताया जा रहा है.मैं सार्वजनिक मंच पर यह कभी नहीं कहता-लिखता, मगर यह सब लिखने के लिए मुझे मुख्यमंत्री के मीडिया कोर्डिनेटर दर्शन सिंह रावत ने प्रेरित किया है. वे मेरी पोस्ट पर मुझे ‘कथित पत्रकार’ कहते हैं, मेरे लिखे हुए को दुर्भावना से लिखा बताते हैं.

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दर्शन जी को मैं बताना चाहता हूं कि मैं आपकी ‘नजर’ का पत्रकार बनना भी नहीं चाहता, न मैंने कभी ऐसा कोई दावा ही किया. मैं तो उन्हें फोन पर ही यह बता देना चाहता था मगर वे तो ‘सरकार’ हैं, वे ऐसे कैसे किसी का फोन उठा सकते है ! मैं उन्हें बताता कि मैं ‘पत्रकार’ कैसे हो सकता हूं भला ! आज तो पत्रकार होने, बनने के लिए ‘लेफ्ट’ या ‘राइट’ होना जरुरी है.किसी बड़े न्यूज चैनल या मीडिया हाउस की नौकरी बजाने वाला पत्रकार होता है.

मैं पत्रकार होता तो या तो आपकी जगह होता या फिर उनकी तरह होता जिन्हें आप सरकारी खर्च पर दारु-मुर्गा उडवाते हैं, पत्रकार होता तो दिन में दस बार न सही एक बार तो जरुर आपको फोन घुमाता. आपके साथ किसी होटल या गेस्ट हाउस में शाम की बैठक फिक्स करता. सरकार पर कलम चलाने से पहले आपसे बताता, उनकी खबर पर बिंदी और कौमा कहां लगाने हैं, आपसे पूछता. आपके स्टोरी आइडिया पर काम करता और सरकार की खबरों को कहां पर किस तरह परोसना है यह भी आपसे ही पूछता. खबर में हैडिंग क्या लगेगा यह भी आपसे ही तय कराता.

मैं पत्रकार होता तो सरकार मुझसे हर साल यह प्रमाण थोड़े ही मांगती कि मैं कुछ लिखता भी हूं या नहीं, और उससे मुझे साल में कम से कम 12 हजार रुपये मिलते हैं या नहीं ! पत्रकार होता तो आपके साथ ही सूचना विभाग के अफसरों का ‘प्रिय’ होता. मौके-बेमौके आप और विभाग के अफसर मेरे साथ खड़े होते, आप सबके साथ मेरे भी व्यवसायिक रिश्ते होते.कभी सरकार के तोहफों से, कभी विज्ञापनों से तो कभी फिल्म डॉक्यूमेंट्री के मोटे आर्डरों से मैं भी ‘उपकृत’ होता.

अपने परिजनों को घुमाने और सैर-सपाटे के लिए मेरे लिए भी सरकारी गाड़ी की व्यवस्था होती, सरकारी गेस्ट हाउसों और होटलों में मेरी भी मुफ्त आवाभगत होती.मैं पत्रकार होता तो मेरी भी हर महीने की दवाइयों और अस्पताल का खर्च सरकार उठाती, सूचना विभाग में मेरे भी बिल लगते.

दर्शन जी आपको ही क्या बहुत से लोगों को मेरा लिखना दुर्भावना लगता है, खासकर सत्ता में बैठे और उनसे जुड़े लोगों को. दोष आपका नहीं है साहब, आप बिल्कुल सही हैं, आप जिस रास्ते से जिस जगह आज जहां बैठे हैं वहां से आपको मेरा लिखना दुर्भावना ही नजर आएगा. आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि जहां बैठकर आप आज राज्य में कौन असली है और कौन फर्जी है का सर्टिफिकेट जारी कर रहे हैं, आपके वहां बैठे होने में मेरा भी व्यक्तिगत योगदान है. इसलिए नहीं कि मैंने इसके लिए सिफारिश की बल्कि इसलिए कि अगर उत्तराखंड राज्य नहीं होता तो आज आप भी वहां न होते जहां से आपको मेरा राज्य हित में कुछ लिखना दुर्भावना नजर आता है.

यह कहने का तात्पर्य मेरा यह कतई नहीं है कि यह राज्य मेरे कारण बना लेकिन यह जरुर बताना चाहता हूं कि मातृशक्ति और मुझ जैसे हजारों युवाओं के संघर्ष की बुनियाद पर बना है. आप तो सरकार के बगलगीर हो, जरा पुलिस के रिकार्ड चैक करवाओ तो पता लगेगा राज्य आंदोलन में 13 मुकदमे दर्ज थे मुझ पर, एक बार नहीं कई बार जेल की यात्रा की, न जाने कितनी ही बार हवालात में पुलिस की यातना झेली हैं.अपने स्वर्णिम वर्ष दिए हैं इस राज्य के संघर्ष को मैंने, और किसी मजबूरी में नहीं बल्कि स्वेच्छा से पूरे होशोहवास में एक सोच के साथ.

राज्य बनने के बाद सरकारी नौकरी में आने का विकल्प मेरे पास भी था पर क्या करें, आपके शब्दों पर ही चलूं तो ‘दुर्भावना’ थी न, इसलिए सरकार की नौकरी का विकल्प नहीं चुना. ऐसा इसलिए नहीं किया महोदय कि मुझे इसकी जरुरत नहीं थी, ऐसा इसलिए किया क्योंकि मेरा मानना था कि इस तरह नौकरी लेने के लिए तो मैंने राज्य आंदोलन में भागेदारी नहीं की थी. खैर आप इस भावना को नहीं समझेंगे. यह आपको और आप जैसे सत्ता की मलाई चाटने वाले तमाम उन लोगों को इतना बताने के लिए है कि जो मलाई आप चाट रहे हैं न, उसके पीछे बहुत से लोगों का जीवन संघर्ष रहा है.

अब आपकी बात करते हैं. आपका मेरा परिचय लगभग उतना ही पुराना है जितना कि मेरी ‘कथित’ पत्रकारिता. आप मुझे कथित पत्रकार मानें मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता, मगर आपको मैं इतना जरुर याद दिलाना चाहूंगा कि दैनिक जागरण में आप और हम सहयोगी भी रहे हैं. आप तो मेरे विषय में सब जानते ही हैं, मेरी जानकारी भी आपके विषय में कोई कम नहीं है. आप शायद यह भी भूल रहे होंगे कि पिछले मुख्यमंत्री हरीश रावत से भी आप ‘सत्ता प्रसाद’ पाना चाहते थे उस वक्त आपने मुझसे भी अपनी पैरवी करायी.

दर्शन जी, सम्मान मैं भी आपका बहुत करता हूं मगर एक पत्रकार के तौर पर कतई नहीं, सम्मान सिर्फ आपकी उम्र का है, आपकी पत्रकारिता का कतई नहीं.आपके समकालीन ही देहरादून और राज्य के दूसरे हिस्सों में बहुत से पत्रकार हैं जो मेरे लिए हमेशा आदर्श रहे हैं. मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आप मेरे वरिष्ठ जरुर रहे मगर आपकी पत्रकारिता मेरे लिए कभी प्रेरक नहीं रही. निश्चित तौर पर आपको बुरा लग रहा होगा, बुरा लगना भी चाहिए. जो आपने शुरु किया उसके लिए तो मैं इससे आगे भी बढ़कर आपके विषय में बहुत कुछ कह बता सकता हूं. मगर मेरे संस्कार मेरी मर्यादा एक सार्वजकि मंच पर इससे ज्यादा बढ़ने की इजाजत नहीं देते.

त्रिवेंद्र सरकार में आज आप जहां है, वहां पहुंचने के लिए मैं समझ सकता हूं आपने क्या कुछ नहीं किया होगा. पता नहीं मुख्यमंत्री को मीडिया प्रबंधन के लिए पत्रकार की जरुरत क्यों थी? मेरा मानना है कि एक पत्रकार कभी मीडिया मैनेजर नहीं हो सकता. पता है मुख्यमंत्री कोई बुरा नहीं होता, मुख्यमंत्री को बुरा बनाते हैं उसके बगलगीर, उसके सलाहकार और आप जैसे वो ‘खास’ जिन्हें मुख्यमंत्री इस भरोसे के साथ अपनी टीम में रखते है कि वे उनकी छवि साफ सुथरी बनाएंगे. सिस्टम का सही फीड बैक देंगे, कहां पर चूक हो रही है इसकी जानकारी देंगे. जहां तक मुख्यमंत्री के रुप में उनकी पहुंच नहीं है वहां तक संवाद स्थापित करेंगे.

उत्तराखंड में तो इतिहास गवाह है कि मुख्यमंत्री अपने बगलगीरों के कारण ही बदनाम हुए हैं. जिन पर उन्होंने भरोसा किया वही पतन का कारण भी बने. दरअसल मुख्यमंत्री की टीम के लोग पावर के इर्द-गिर्द घूमते हुए खुद को एक पावर समझ बैठते हैं. मुख्यमंत्री के साथ घूमते-घूमते उनकी एक समांतर सत्ता चलने लगती है. ऐसे में वे मुख्यमंत्री के लिए नहीं, अपने लिए काम कर रहे होते हैं. मुख्यमंत्री के प्रति उनकी सत्यनिष्ठा संदिग्ध रहती है. मुख्यमंत्री को दिये जाने वाले हर फीडबैक, हर सलाह में उनकी अपनी ‘राजनीति’ छिपी होती है. वे मुख्यमंत्री को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश ही नहीं करते बल्कि ऐसा संदेश पूरे सिस्टम में देने की कोशिश भी करते हैं. जब तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे शख्स को इसका पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र बुरे नहीं हैं, कई मायनों में औरों से उन्हें बेहतर कहा जा सकता है लेकिन उनकी छवि तो उनके आप जैसे अपने ही बिगाड़ने में लगे हैं. सच यह है कि उनके पास सही फीडबैक ही नहीं है. जिन्हें फीड बैक देना चाहिए वो तो अपनी दुकानें चलाने में लगे हैं. कुछ नहीं, मुख्यमंत्री सिर्फ अपनी टीम में खास जगहों पर बिठाए लोगों की एक गोपनीय जांच मंगा लें तो सबका पता चल जाएगा कि कौन कितना वफादार है उनका. त्रिवेंद्र का मंत्री रहते हुए भी सलाहकार रखने का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा है.

आप अपना ही लीजिए आपकी नियुक्ति क्यों की गयी ! आप हैं मुख्यमंत्री के मीडिया कोर्डिनेटर, क्या काम होता है मीडिया कार्डिनेटर का, यही न कि मुख्यमंत्री के लिए मीडिया के साथ बेहतर समन्वय का काम करना. आप क्या कर रहे वहां आप बेहतर जानते हैं, आप तो वहां से असली और फर्जी का सार्टिफिकेट बांट रहे हैं. आप वहां मुख्यमंत्री को भी उसी चश्मे से मीडिया को दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जिस चश्मे से आप खुद देखते हैं. आप तो मुख्यमंत्री के यहां मीडिया का नहीं बल्कि मीडिया के एक ‘गैंग’ का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

मीडिया में आपकी कितनी स्वीकार्यता है यह किसी से छिपा नहीं है, अब तो आपको भी इसका बेहतर अंदाजा हो चुका होगा. ध्यान रहे मीडिया से मेरा तात्पर्य प्रिंट, इलेक्टानिक और सोशल मीडिया से है. आप वहां बैठकर अपनी भूमिका से कितना न्याय कर रहे हैं वह मुख्यमंत्री का भले ही नजर न आता हो लेकिन मीडिया में साफ नजर आता है. आपने अपना काम जिम्मेदारी और भरोसे के साथ किया होता तो मुख्यमंत्री को लेकर इस तरह का महौल कतई नहीं बना होता.

अंत में, दर्शन जी बेहतर हो आप सर्टिफिकेट बांटने के बजाय उस पर ध्यान दें जिसके लिए आपको राज्य के कर दाताओं की रकम से मोटा वेतन और सुविधाएं दी जा रही हैं. सरकार की योजनाओं और जनहित में चलाई जाने वाली नीति-रीतियों का प्रचार करें. पत्र- पत्रिकाओं में लेख लिखें, सरकारी योजनाओं और उनके असर पर ब्लाग लिखें, सरकारी गेम चेंजर योजनाओं और सफलता की कहानियों के बारे में लिखें, उनका प्रचार-प्रसार करें, मुख्यमंत्री का अधिक से अधिक लोगों से संवाद कराएं, सरकार के फैसलों और नीतियों पर उन्हें सही फीड बैक उपलब्ध कराएं. मुझे लगता है कि इसी सब के लिए आपको संभवतः रखा गया होगा, इसी में आपका हित भी है. मुझ जैसे ‘कथित’ से टकराकर आपका कोई भला नहीं होगा।

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Prakash Pandey

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