माटी के रंग

जरा मुस्कराइए: शक करने का मौसम

शक करना कला है। कुछ दिमागदार इसे विज्ञान की श्रेणी में भी रखते हैं। या ये कहें कि ये मनोविज्ञान का मौजू चैप्टर है। शक अभी से नहीं बहुत पहले से किया जा रहा है। आदि-अनादि काल से शक का कीड़ा मानव के दिमाग में कुलबुलाते आया है। शक का मिमाज कुछ हद तक शकुनि जैसा है। जो गाहे-बगाहे महाभारत करवा ही डालता है। कोरोनाकाल से पहले जब जीवन सामान्य चल रहा था तब भी शक की खूब चली थी। उस समय भी हमारे दिलों के अंदर शक का कीड़ा भरतनाट्यम करता रहा। रात को देर से आने पर पत्नी की शक की सुई घूमने लग जाती थी। इस सुई के साथ-साथ कई सवाल भी पति के इर्दगिर्द घूमते। जैसे , “अभी तक कहाँ थे? किसके साथ थे? ये तुम्हारी शर्ट पर बाल किसका है? ये तुम्हारी कमीज पर लिपिस्टक सरीखा दाग कैसे लग गया?” ये सारे प्रश्न शक की गर्भ से ही पैदा होते थे। बैचलर बॉयज के लेट घर आने पर पिता शक का डंडा उठाकर मेन गेट पर खड़े मिलते थे। वो भी सवाल दागते, “बरखुर्दार इतनी रात को कहां से आ रहे हो। आये तो आये ये शराब की स्मेल कहाँ से ला रहे हो? सिगरेट का धुंआ भी तुम्हारी सारी दलीलें धुवां-धुवां किये जा रहा है। क्या बात है?”
ऐसे ही शक का शकुनि निब्बा और निब्बी के बीच भी शतरंज खेलता नजर आता है। निब्बा का बार-बार कॉल बिजी आने पर निब्बी का शक गहरा जाता है। वह कन्फर्म हो जाती है कि अगले की कहीं और सेटिंग चल रही है। फिर मौका पाते ही वो अपने निब्बा पर बरस पड़ती है।
पड़ोसी के महंगे फ्रिज या टीवी खरीद लाने पर भी ऐसा लगता है अगला ऊपरी कमाई कर रहा है। शक होने लगता है कहीं दो नम्बर की कमाई से टीवी, फ्रिज का एक नंबर का मॉडल तो नहीँ खरीदा जा रहा।
इधर जब से कोरोनाकाल आया है। शक करने की हजार वजह हो गई हैं। ऐसा लग रहा है जिंदा रहना है तो शक करना जरूरी है। इस कोरोनाकाल में जो शक करेगा जो शक्की होगा वही जिंदा बचेगा। खुद पर शक करते रहेंगे तो बार-बार हाथ धोते रहेंगे वायरस से बचे रहेंगे। घर से बाहर निकलेंगे सीढ़ियों की रैलिंग में शक करेंगे उसे नहीं छुएंगे तो कोरोना को मात देंगे। दुकानदार, आस-पास खड़े लोगों पर भी शक करना लाजमी है, जरूरी भी। जिससे आप उन लोगों से ज्यादा बातें नहीं करेंगे। उनसे हाथ नहीं मिलाएंगे। सीधे अपना काम कर के घर लौट आएंगे। घर आते ही घर वालों को आप पर शक होगा। आपको अपने हाथों और खरीदे गए सामान पर शक होगा। फिर हाथ और समान की धुलाई होगी। जिसके बाद शक की सांसें थम जाएंगी।
इस दौर में शक से उपजी बैचेनी से ही आप खुद को बचा सकते हैं। घर पर आये हर बंदे पर शक करें। उसे घर मे न घुसने दें । उससे दूरी बनाए रखें। घर से बार -बार बाहर ना जाये। मन में शक बनाएं रखें कि बाहर जाने से कोरोना वायरस घर के अंदर आ सकता है। या ये शक पैदा करें कि बाहर जाते ही आपकी कुटाई हो सकती है। पुलिस के सेनेटाइज किये गए डंडे से आपकी तशरीफ़ लाल हो सकती है। आपकी चाल में लचकन पैदा हो सकती है। घर के अंदर रहने पर भी पत्नी को ये शक न होने दें कि आप बर्तन नहीं धोएंगे, कपड़े नहीं धोएंगे, खाना नहीं बनाएंगे। मटर नहीं छीलेंगे। अगर पत्नी को इन बातों पर थोड़ा सा भी शक पैदा हो गया तो बेशक घर के अंदर क्लेश का सिलेंडर फट सकता है। आप बुरी तरह उसकी चेपेट में आ सकते हैं।
इसीलिए शक के इस मौषम में शक्की हो जाइए। खुल कर शक कीजिये।

ललित शौर्य( लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं)
ग्राम+पोस्ट-मुवानी
जिला-पिथौरागढ़
उत्तराखंड

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Prakash Pandey

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