पांडेयजी तो बोलेंगे

जुबां खामोश और कलम निःशब्द: इस खबर का टाइटल के लिए खाली जगह को भरने की अपील आप से …………………………………………………………… ……………………………..

कलमकार हूं समाज का आइना दिखाना मेरा कर्तव्य है. सामाजिक गतिविधियों को सामने लाना और फिर उसके बाद प्रशासनिक अमल की जानकारी आप तक पहुंचाना मेरा कर्तव्य है. मैं बोलता बहुत हूं लेकिन आज निशब्द हूं. मेरी कलम लिखने से मना कर रही है. वजह धरातल पर जो लॉक डाउन की तस्वीरें सामने आ रही हैं उनके लिए निशब्द हो गया हूं.
जुबां खामोश हो गई है. ऐसे ऐसे बेबस कर देने वाली तस्वीरें मन को झकझोर देती हैं. ऐसी ही तस्वीरें आपके सामने लेकर आए हैं. चाहेंगे स्टोरी का हेड लाइन ऑफ दें यदि आप नहीं दे पा रहे हैं तो इस स्टोरी का हेड लाइन सरकार दे …………………
यह जो तस्वीर आप देख रहे हैं यह तस्वीर आंध्रप्रदेश के कुरनूल से सामने आई है. सुलगती सड़कों पर बिलखते मासूम, पिता की छांव में इस तरह घर का सफर तय कर रही है. बेटियां जिन्हें देखकर आपका दिल दहल जाएगा. दावा है कि पत्थर दिल भी एक बार को पिघल जाएगा बेबस, असहाय, मजदूरों के लिए अब चिलचिलाती धूप तपती सड़कें और रेल की पटरी इतना ही नहीं यमुना का पानी भी रास्ता नहीं रोक पा रहा है. जो बच्चे थोड़ा बहुत भी चल सकते हैं वह चलने को तैयार है लेकिन जो चल नहीं सकते वह पिता की गोद में हजारों किलोमीटर का सफर तय कर रहे हैं. आंध्र प्रदेश से सामने आई इस तस्वीर में एक पिता 12 सौ किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ जाने के लिए पैदल निकल पड़ा है.
कहार की भूमिका में बाप के दो बच्चे साथ दिखाई दे रहे हैं. काम धंधा ठप होने के बाद विकल्प हिन होते ही कुरनूल में रहने वाले एक मजदूर ने अपने गृह जनपद छत्तीसगढ़ जाने का योजना बनाया. रास्ता लंबा था, समस्या बड़ी थी. दो दूधमुहे बच्चों को साथ लेकर घर पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं था क्योंकि मासूम पैदल भी नहीं चल सकती थी. ऐसे में पिता ने अपनी बेटियों के लिए एक कावड़ बना ली जिसमें दोनों को बिठाया और उस कांवड़ को अपने कंधे पर लादकर इस भीषण गर्मी में सफर पर चल पड़ा.

कल तक मजदूर देश के सबसे मेहनती और जाने क्या क्या कहलाते थे लेकिन लॉक डाउन के बाद किस्मत के मारे बेचारे बन गए. बेबस मायूस हैं आंखों में सपने चिलचिलाती धूप में अपने घर निकलने की पीड़ा इनकी आंखों में तैरती साफ दिखाई दे जाती है.

दूसरी तस्वीर भी कम दुखी करने वाली नहीं है. इस तस्वीर में एक बाप अपने मासूम बच्चे को तपती दोपहरी में साइकिल पर सवार करके ले जा रहा है. थकान इतनी की मासूम धूप में ही सो गया.


छत्तीसगढ़ के रायपुर से ही यह तीसरी मन को विचलित कर देने वाली यह तस्वीर सामने आई जहां खेलने कूदने की उम्र में एक मासूम घर जाने के लिए निकल पड़ा. उसने अपने एक हाथ में छोटे भाई को और दूसरे हाथ में एक रोटी पकड़ रखी है.


राजस्थान के भरतपुर से आई है तस्वीर चिलचिलाती धूप में नंगे पांव सड़क पर चलने को मजबूर एक मासूम के दर्द को बयां कर रही है मां जबरदस्ती घसीट रही है और दूसरा बच्चा गोद में है.

ऐसी न जाने कितनी तस्वीरें हैं जिनको आपके या फिर सरकार के कैप्शन की जरूरत है. ऐसी न जाने कितनी तस्वीरें हैं जो 1947 से लेकर अब तक के के लिए विकसित भारत की तस्वीर को बयां कर रही हैं. ऐसी न जाने कितनी तस्वीरें हैं जिन पर देश के जिम्मेदार नागरिक मौन हैं.

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Prakash Pandey

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