माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने 20 मार्च को देश के नाम अपने संबोधन में सभी देशवासियों से एक दिन (22 मार्च) के जनता कर्फ्यू का आवाहन किया, जिसका सभी देशवासियों ने खुले दिल से स्वागत किया। और जैसा कि कुछ समाचार चैनल उम्मीद जता रहे थे, 22 मार्च की शाम होते होते लगभग हर राज्य ने अगले 3 से 9 दिनों के लिए आंतरिक बंदी (लॉक डाउन) घोषित करने के साथ साथ राज्य की सभी सीमाएं भी बंद कर दीं जिसके परिणामस्वरूप सभी सरकारी या निजी बसों / कारों/ टैक्सियों के अंतरराज्यीय सफर पर भी रोक लग गई। उसके बाद 22 मार्च से भारतीय रेल की सेवाएं भी निलंबित कर दी गईं, यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि राज्यों के बार बार आग्रह के बावजूद हवाई सेवाएं 24 मार्च तक चलती रहीं।
देश में सभी लोग इस पहल का तहे दिल से स्वागत और सहयोग करते रहे चाहे वो अमीर हो या गरीब, औरत हो या पुरुष, बच्चा हो या बुज़ुर्ग। सबको लगा कि बस मार्च तक की बात है और उसके बाद सब कुछ अगर एक साथ नहीं सही तो धीरे धीरे सामान्य होने लगेगा। लेकिन 24 मार्च को देश के नाम अपने अगले संबोधन में प्रधानमंत्री जी ने लॉकडाउन की अवधि बढ़ाकर 14 अप्रैल कर दी जिसका पुनः देश के सभी लोगों ने खुले दिल से स्वागत किया और अक्षरशः पालन करने का खुद से वायदा भी किया। प्रधानमन्त्री जी का ये फैसला एकदम सही भी था क्युकी शायद कोरोना वायरस से फैल रही इस महामारी कोविड19 से बचने का यही एकमात्र रास्ता भी है और इसका हमें पालन करना ही चाहिए क्योंकि जान है तो जहान है। अगर सरकार ऐसी पाबंदियां नहीं लगाती तो भी हमें खुद की सुरक्षा के लिए खुद को लॉक डाउन करना बेहद जरूरी था।
लॉक डाउन की घोषणा के साथ साथ सरकार ने और भी कई ज़रूरी चीजों का बेहद ध्यान रखा जैसे कोविड19 की महामारी झेल रहे देशों में फंसे अपने नागरिकों को सुरक्षित देश वापस लाया गया और उन्हें विशेष देखभाल में अलग रखा गया। इसी बीच देश के लगभग सभी सरकारी शिक्षण संस्थानों के छात्रावासों को बंद करके छात्रों को उनके घर भेज दिया है।लॉक डाउन की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री जी ने जनता को ये विश्वास दिलाया कि ज़रूरत की सभी चीजों जैसे राशन, सब्जी, दूध वगैरह कि पूरी व्यवस्था है और किसी भी हालत में इन चीजों की कमी नहीं होने देंगे। इन सब वादों और कोशिशों के बावजूद 24 मार्च की रात लोगों में थोड़ी सी हलचल हुई लेकिन लोग समय रहते ही संभल गए।
सबकुछ ठीक चल रहा था, सड़कें सूनी हो गई थीं, शहरों में प्रदूषण घटने लगा था, हवा साफ होने लगी थी, आसमान फिर से गहरा नीला दिखने लगा था, पक्षी वापस मंडराने लगे थे और उनकी चहचहाहट वापस सुनाई देने लगी थी लेकिन तभी अचानक से रोड से भीड़ की हृदय विदारक तस्वीरें आने लगीं। गरीब मजदूर जो रोज़ कमाता खाता है, जिसके पास महीनों का राशन खरीदने का पैसा नहीं होता, जो एक किराए के कमरे में अपना पूरा परिवार पालता है, जो रोज़ सुबह इस उम्मीद से बाहर निकलता है कि दिन में कुछ काम करेगा तो रात में चूल्हा जल पाएगा, जो समाचार नहीं देख पाता है, जो ये सोचकर बैठा था कि ये लॉक डाउन महज चंद दिनों का है और हफ्ते भर बाद वो वापस सामान्य जीवन जी पाएगा, वो मजदूर अपने परिवार के साथ सैकड़ों मील दूर स्थित अपने गांव के लिए कूच करने के लिए मजबूर हो गया। इन मजबूर मजदूरों की ये तस्वीरें सच में बेहद मार्मिक हैं इनमें से कई तो दुधमुंहे बच्चे को लेकर पैदल सफर कर रहे हैं तो कई बुजुर्ग मां बाप को तो कोई विकलांग पत्नी को लेकर सफर कर रहा है।
आखिरकार ये मजदूर इन हालातों में भी ऐसा कदम उठाने को मज़बूर क्यूं हुए। क्यूंकि शायद उन्हें ये आभास हुआ कि ये लॉकडाउन लंबे समय तक चलने वाला है और उनके पास ज्यादा दिनों का राशन नहीं बचा है, शायद उन्हें ये लगा कि कोई उनकी सहायता करने वाला नहीं है, शायद उन तक कोई मदद करने वाला हाथ नहीं पहुंचा, शायद उन तक सरकार की घोषणाएं नहीं पहुंची, शायद उनको सरकार की घोषणाओं पे यकीन नहीं हुआ क्यूंकि उन्हें जमीन पे इसका कुछ असर नहीं दिखा, शायद विधायिका का आखिरी पायदान समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने में असफल हो गया, शायद उन्हें गला कि कहीं कोरोना से पहले उन्हें भूख ही ना मार डाले, शायद उन्हें लगा कि हर वक़्त में जो लोग उनके साथ खड़े होते थे वो खुद लॉक डाउन में बंद हैं, शायद प्रधानमंत्री जी नवरात्रि के मौके पर लोगों से 9 लोगों की सहायता की अपील करते समय ये भूल गए थे कि सहायता करने वाले लोग भी अपने घर में बंद हैं, शायद शायद, शायद…। बहुत कुछ ऐसा है जिसने उन गरीबों को मज़बूरी में ये कदम उठाने पर मज़बूर किया।
कई सवाल उठ रहें हैं सरकार पे और उठेंगे भी… कि आखिरकार सरकार कहां असफल हो गई? आखिरकार कहां चूक हुई? क्या जैसे विदेश से नागरिक लाए गए, जैसे समय रहते छात्र अपने घरों की पहुंचाए गए, वैसे ही इन मजदूरों को उनके घर नहीं पहुंचाया जा सकता था? क्या जैसे 22 मार्च के लॉक डाउन के बाद हवाई जहाज उड़ते रहे, वैसे ही ट्रेनें 3-4 दिन और नहीं चलाई जा सकती थीं? क्या समय रहते ग्राम ब्लॉक - तहसील - जिला स्तर पर सरकारी स्कूलों और भवनों में कैंप नहीं बनाए जा सकते थे? क्या बाकी सरकारी योजनाओं की तरह उन कैंपों का प्रचार प्रसार नहीं किया जा सकता था जिससे कि लोगों को उन कैंपों की आसानी से जानकारी हो जाती? क्या किसी तरीके से गैर पंजीकृत मजदूरों तक सहायता राशि नहीं पहुंचाई सकती थी जबकि चुनावों से पहले 20 दिन में किसानों तक 2000 रुपए पहुंचाए गए थे? क्या राज्य सरकारें इस वक़्त गरीबों में राज्य के आधार पर भेद भाव से बच नहीं सकती थीं? ऐसे बहुत सारे सवाल हैं।
हालाकि कुछ राज्य सरकारों ने बिना देरी किए यथासंभव सहायता मुहैया करवाई जैसे कि गुजरात के उपमुख्यमंत्री जी ने रात में ही खुद पहुंचकर मजदूरों के लिए खाने और गाड़ी का इंतजाम किया, क्या वैसे ही बाकी सरकारें बिना देरी किए सहायता नहीं पहुंचा सकती थीं। सवाल सरकार की नीयत पे नहीं है लेकिन तैयारियों पे तो है, कहीं ना कहीं कोई ना कोई कमी तो रह ही गई है। शायद बहुत कुछ और किया जा सकता था जो नहीं किया गया, जो जल्द से जल्द किया जाना चाहिए और आगे के लिए एक सीख होनी चाहिए जिससे कि समाज के आखिरी व्यक्ति को ऐसे मजबूर ना होना पड़े।
खैर, इस मुश्किल हालात में सेवाएं दे रहे सभी जवानों, चिकित्सकों, कर्मचारियों, डिलीवरी ब्वॉयज और स्वयंसेवकों को मेरा रहे दिल से शुक्रिया और सलाम। बाकी भगवान सभी को साहस, हिम्मत और सद्बुद्धि दे।
हिमांशु पाण्डेय



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