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गोवेर्धन पूजा : मान्यताओं के विरुद्ध पहले विद्रोह का आरंभ!

दीपावली का पर्व बीत चुका है और अगली सुबह एक नई शुरुआत के साथ आपके साथ है. पांच दिन के प्रकाश पर्व में दिवाली की अगली सुबह मतलब आज मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा, गोधन पूजा या जिसे आप अन्नकुट के नाम से भी जानते हैं, उत्तर भारत के पशुपालकों का बड़ा पर्व है. इस पर्व को हम हमारी संस्कृति में सदियों से स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध पहला विद्रोह भी मान सकते है. देवराज इंद्र की निरंकुश सत्ता के प्रतिरोध में इस पर्व की शुरुआत द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने की थी.

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार जब अतिवृष्टि से गोकुल और वृंदावन जलमग्न हो गये, तो वहां के तमाम निवासियों ने अपनी और अपने पशुधन की रक्षा के लिए वर्षा के देवता इंद्र से प्रार्थनाएं कीं. इंद्र को प्रसन्न करने के लिए वैदिक अनुष्ठान किये गये, किंतु भरपूर ‘हवि’ पाने के बावजूद न इन्द्र मेहरबान हुए और न ही वर्षा रुकी. जलप्रलय की स्थिति देख कृष्ण ने अहंकारी इंद्र की आराधना और उनको समर्पित वैदिक अनुष्ठान बंद करा दिये. उस युग में शक्तिशाली इंद्र को गौरव से अपदस्थ कर देना स्थापित सत्ता के विरुद्ध किशोरवय श्री कृष्ण का बड़ा क्रांतिकारी कदम था.

तमाम आशंकाओं के बीच कृष्ण ने गोकुल और वृंदावन के लोगों को ऊंगली से गोवर्धन पर्वत की ओर चलने का संकेत किया. कृष्ण की बात मान कर लोगों ने अपने परिवार, धन-धान्य और पशुओं के साथ गोवर्धन पर्वत की शरण लेकर जलप्रलय से अपनी जान और पशुधन की रक्षा की थी. माना जाता है कि उसी दिन से ऋग्वैदिक ऋचाओं के सबसे शक्तिशाली देवराज इंद्र की पूजा बंद हुई और गोवर्धन पर्वत के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन का अनुष्ठान आरंभ हुआ.

इस पर्व की विशेषता यह है कि इस दिन पशुधन को स्नान करा कर उन्हें रंग लगाया जाता है, उनके गले में नयी रस्सी डाली जाती है और उन्हें गुड़-चावल खिलाया जाता है. गाय के गोबर से घर-आंगन लीपने के बाद प्रतीकात्मक रूप से गोबर से ही गोवर्धन पर्वत की आकृति बना कर उसके प्रति श्रद्धा निवेदित की जाती है.
आशा

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आप सभी पाठकों को गोवर्धन पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं!

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Prakash Pandey

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