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कोरोनावायरस काला इतिहास, हिंदुस्तान के इतिहास में दर्ज हुआ 19 मई!

नई दिल्ली. हिंदुस्तान के इतिहास में 19 मई कोरोना वायरस के चलते काले इतिहास के तौर पर याद किया जाएगा. इसका कारण 110 दिन के अंदर भारत में कोरोनावायरस के संक्रमण की संख्या एक लाख पार कर गई.
ऐसा नहीं है कि हिंदुस्तान में पहली बार महामारी आई है.इससे पहले भी हिंदुस्तान के इतिहास में महामारी में दर्ज की गई है लेकिन कोरोना के चलते महामारी का यह इतिहास भयावह होने जा रहा है.
भारत में समय-समय पर तीन बड़ी महामारी फैली जिन्होंने अपने समय में आतंक मचाया था.
जब कोई बीमारी बहुत कम समय में बेहद तेजी से फैलने लगे तो उससे महामारी कहा जाता है. महामारी के लिए अंग्रेजी में दो अलग शब्द है जिसमें एक एपिडेमिक यानी वह बीमारी जो किसी एक इलाके या देश में तेजी से फैले और दूसरी पैनडेमिक यानी वह बीमारी जो देश की सीमाओं से निकलकर कई देशों में फैल जाती है.
हाल ही में अगर याद किया जाए तो सन 2009 में स्वाइन फ्लू को महामारी घोषित किया गया था. स्वाइन फ्लू ने दुनिया भर में दो लाख जिंदगियों को खत्म कर दिया था.
भारत में कोरोना वायरस और स्वाइन फ्लू से पहले तीन बार यहां महामारी घोषित हो चुकी है. सन 1940 सन 1970 और 1995 हिंदुस्तान के इतिहास में सबसे खराब साल माने जाते हैं. आइए जानते हैं हिंदुस्तान में फैली तीन महा मारियो की डिटेल…

कालरा( हैज़ा)

1940 के दशक में आजादी की लड़ाई लड़ रहे भारत को कालरा यानी हैजा जैसी बीमारी से जूझना पड़ा था. इस बीमारी की सबसे बड़ी वजह पीने का गंदा पानी थी और तालाब में पानी में क्लोरीन मिलाकर इस से बचाव की कोशिश की जाती थी लेकिन यह अधिक कारगर साबित नहीं हुई. आज प्यूरीफाइड पानी पूरे देश में उपलब्ध है.
1946 के आसपास कालरा (हैजा) भारत के गांव में फैल गई. इसका स्वरूप इतना खतरनाक था कि कई गांव समाप्ति की दौर की तरफ चल पड़े थे. 1940 के दौर में भारत में हैजे के कारण मौतों का सिलसिला बहुत बड़ा था. एक रिपोर्ट के मुताबिक 1975 के दशक में बंगाल की खाड़ी के इलाके में यह बीमारी फिर से फैली थी.
तत्काल में इस बीमारी का कोई इलाज नहीं बन पाया.1990 के दशक में इस बीमारी का टीका खोज लिया गया और इस पर काबू पाया गया. यह खत्म है इस बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता. गांव में अभी रह रहकर यह बीमारी फैल जाती है.

चेचक

भारत में 1960 के दशक के आसपास चेचक का बहुत प्रभाव पड़ा. चेचक से पूरी दुनिया में बहुत तबाही हुई. 18 वीं सदी के प्रारंभ में यूरोप में हर साल 400000 लोगों की जान जाती थी. बीसवीं सदी की बात करें तो चेचक की वजह से दुनियाभर में लगभग 30 करोड लोगों की मौत हुई. चेचक में आमतौर पर चेहरे और शरीर पर लाल धब्बे और दागों के साथ संक्रमण होता है.
चेचक दो तरह का होता है स्मॉल पॉक्स और चिकन पॉक्स.
चेचक का प्रभाव शरीर में तकरीबन 7 दिनों तक रहता है. इसका कोई इलाज नहीं है इसे रोकने के लिए टीका लगाया जाता है. भारत में 1970 में इसे रोकने का अभियान शुरू किया गया. इस अभियान के तहत पूरी जनसंख्या को टीका लगाना था जो काफी मुश्किल था.1977 में इसके उन्मूलन का दावा किया गया लेकिन हर साल भारत में लगभग 27 लाख बच्चों को चेचक होता है. डॉक्टरों के अनुसार 12 से 15 साल तक के बच्चों के टीका जरूर लगवाना चाहिए.

प्लेग

चूहों के शरीर पर पलने वाले कीटाणुओं की वजह से भारत में महामारी घोषित हुए प्लेग का समय सितंबर 1994 रहा. सूरत की लगभग 25 फ़ीसदी आबादी इस बीमारी के भय से शहर छोड़ कर चली गई. आजादी के बाद इसे दूसरा सबसे बड़ा पलायन कहा गया. पहले अमीर लोगों ने गाड़ियों से और फिर डॉक्टर और केमिस्ट ने भी शहर छोड़ दिया. सूरत हीरा और कपड़े की फैक्ट्रियों के लिए जाना जाता है. बिहार और उत्तर प्रदेश की बड़ी जनसंख्या सूरत में रह रही थी जो उस समय वापस लौटी और जब वह लोग लौटे तो उनके साथ उनके गांव प्लेग भी पहुंचा. सत्याग्रह की एक रिपोर्ट के अनुसार 1994 में देश के अट्ठारह सौ करोड़ का नुकसान हुआ. लंदन में एयर इंडिया के प्लेन को प्लेग प्लेन कहा गया जबकि ब्रिटिश अखबारों में इसे मध्यकालीन श्राप का नाम दिया गया.
इस बीमारी को वैज्ञानिकों ने येरसीनिया पेस्टिस का नाम दिया. दरअसल चूहों के शरीर पर दो तरह के बैक्टीरिया होते हैं जिन्हें न्यूमॉनीक और ब्यूबॉनिक कहा जाता है. यही कारण बनते हैं प्लेग के फैलने के.
19वीं शताब्दी में फैल रहा प्लेग 1815 के आसपास गुजरात के कच्छ और काठियावाड़ में यह सबसे पहले फैला फिर अगले वर्ष हैदराबाद और अहमदाबाद में फैला इस बीमारी के चलते सैकड़ों लोगों की जाने जाने लगी जिसके बाद सन 1853 में एक जांच कमीशन नियुक्त किया गया. निष्कर्ष निकला प्लेग महामारी की साइकिल चलती थी. यह कुछ कुछ सालों के बाद फैलता था और सैकड़ों जाने ले लेता था. 1876 में एक बार फिर फैला और 1898 में फैलाव के बाद 20 साल तक लगातार देश के लोगों की जान लेता रहा. प्लेग से सबसे अधिक बंगाल और मुंबई प्रभावित हुए.
इसके बचाव के लिए टीके लगवाए जाते हैं. एंटीबायोटिक दवाओं की खुराक दी जाती है. स्ट्रैप्टो मायसिन, टेट्रा साइक लाइन जैसे एंटीबायोटिक इसमें प्रयोग किए जाते हैं.

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Prakash Pandey

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