विश्व की सबसे बडी पार्टी भारतीय जनता पार्टी अब चार लोगों की पार्टी हो गई है.सुनने में बड़ा अजीब लगता है लेकिन पूरा लेख पढ़ने से आपको उसके पीछे की सच्चाई मालूम हो जाएगी. नि:संदेह तीन लोगों को आप जानते हैं चौथ व्यक्ति से आज हम आपका परिचय करा देते हैं. भाजपा के नए अध्यक्ष की ताजपोशी के बाद पूरी पार्टी की रुपरेखा ना केवल बदल जाएगी बल्कि पार्टी में नई ऊर्जा का संचार भी होगा. पार्टी के नए अध्यक्ष और उनके बाद होने वाले परिवर्तनों पर आधारित आज का यह लेख…
नई दिल्ली. एक लंबे समय बाद भारतीय जनता पार्टी में अंततः बदलाव हो ही गया. पार्टी के सीनियर मोस्ट नेता और कार्यकारी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की ताजपोशी कल विधिवत रुप से अध्यक्ष पद पर हो गई. इसके साथ ही सरल स्वभाव के नड्डा के सामने अगले 3 साल में बड़ी चुनौतियां सामने आने वाली हैं. विवादों से दूर और आराम से कम करने वाले नड्डा अमित शाह जैसा तेवर शायद ही ला पाएंगे.
खिलाडी से कप्तान बने नड्डा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे विश्वसनीय में से एक हैं लेकिन मोदी और शाह दोनों ही संबंधों से अधिक काम के परिणाम पर ध्यान देते हैं. हालाकि विरोधी दल नड्डा को अमित शाह के हाथों की कठपुतली बता रहे हैं. मिमिक्री के उस्ताद नड्डा को नई भूमिका में आने के बाद उन्हें अपने शरीरिक वज़न को घटाने और राजनीतिक वजन को बचाने की भी चुनौती रहेगी.
एक नज़र नड्डा पर
नड्डा अपने छात्र जीवन मे एनसीसी के अच्छे कैडेट रहे हैं. जितना परिश्रम नड्डा ने अपने राजनीतिक जीवन में किया है उनको बदले में उससे कहीं ज्यादा ही मिला है. बाबरी विध्वंस बाद जब आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया था, यही वह समय था जब उनका उदय हुआ.उसके बाद उनके स्वभाव में उग्रता देखने को मिली है. 1993 में पहली बार विधायक बनने के एक वर्ष के भीतर ही नेता प्रतिपक्ष बन गए. हिमाचल में इबारत लिखते हुए दूसरी और तीसरी बार जीते और सरकार में मंत्री बन गए.
जैसा कि हमने पहले ही कहा था कि परिश्रम से अधिक पाने वाले नड्डा भाग्य के धनी हैं यही कारण रहा कि विधानसभा के चुनाव छोड़कर वह राज्यसभा सदस्य बने. इतना ही नही अपने कौशल का उपयोग कर प्रेम कुमार धूमल और शांता कुमार की गुटबाज़ी से भी दूरी बनाए रखी.
…तो क्या यही अवसर आज काम आया
हिमाचल के प्रभारी रहते हुए मोदी के साथ अधिक समय बिताया उस समय का साथ 2014 में भी काम आया. 5 साल पहले भी अपनी लगन के चलते नड्डा अध्यक्ष पद की रेस में थे लेकिन राजनीति के शह में अमित शाह से मात खा गए. लेकिन मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री बने. मोदी 2.0में नड्डा को मंत्रिमंडल में जगह नही मिली, जो नड्डा की निराशा का कारण बन गए. लेकिन कुछ ही समय बाद पार्टी ने उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया.
ये खूबी नड्डा को अलग बनाती है
उनकी काम करने की क्षमता को लेकर किसी भी प्रकार का सवाल नहीं हैं.सवालों को टालने की कला नड्डा में कूट-कूट कर भरी ही है. इतना नहीं उनके बारे में यह कहा जाता है कि जो कोई काम उनके पास लेकर जाया जाता है, उसे पूरा करने की कोशिश जरूर करते हैं. जानकारी लगभग सभी बातों की होती है लेकिन उनका हाजमा ठीक है बताते कुछ नहीं. पत्रकारों से दोस्ती बड़ी जल्दी कर लेते हैं.
सबसे बड़ी चुनौती
नड्डा व्यवहार कुशल व्यक्ति हैं और उनका यही स्वभाव पार्टी के लिए सबसे बड़ी बाधा भी हो सकता है. कारण अमित शाह जैसा व्यक्ति जिसने पार्टी की ना केवल दशा बदल दी बल्कि पूरी कार्य संस्कृति भी बदल कर रख दी. यदि शिकायतों की बात करें तो पुराने पार्टी नेता अपनी शिकायत करते हैं, और कहते हैं कि या भाजपा पुरानी वाली भाजपा नहीं. मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने पार्टी की जीत की भूख को बढ़ा दिया है. पार्टी को हार जीत महसूस होती है. हारने पर दुख और जीतने पर जश्न पार्टी में जरूर होता है. इसलिए शाह से बड़ी लाइन खींचने में नड्डा को चोटी का जोर लगाना पड़ेगा फिर भी कामयाब होंगे यह कहना मुश्किल होगा.
हिमाचल प्रदेश या केंद्र में मंत्री के रूप में अपने कामकाज से जेपी नड्डा कोई छाप छोड़ने में सफल नहीं रहे हैं. उनकी परफ़ॉर्मेंस औसत दर्जे की ही रही है. अमित शाह को लाभ मिला कि वे कम उम्र से ही मोदी की कार्य संस्कृति का हिस्सा रहे. अमित शाह की भी यह ख़ूबी थी कि वे प्रधानमंत्री के इशारे को समझते थे. इसलिए उन्हें पार्टी चलाने या कड़े और बड़े फ़ैसले लेने में कोई समस्या नहीं हुई. क्या नड्ड़ा ऐसा कर पाएंगे?
कुछ सवाल जिनके जवाब आपको ढूंढने हैं.
जी हां, ऐसे कुछ सवाल हैं जिनके जवाब आपको ही ढूंढने होंगे. हमने कुछ जानकारी हासिल की उसके मुताबिक
1- किसी चर्चा में पार्टी के एक नेता ने अमित शाह से नड्डा जी के स्वभाव के बारे में पूछा. अमित शाह का संक्षित सा जवाब था- नड्डा जी सुखी जीव हैं. अब आप इसका मतलब अपने हिसाब से निकाल सकते हैं.
2-अब दो प्रश्न उठते हैं. एक, नड्ड़ा के स्वभाव के बारे में जानते हुए भी उन्हें इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी क्यों सौंपी जा रही है? इसी से उपजा है दूसरा सवाल. क्या अमित शाह नेपथ्य से पार्टी चलाएंगे. दूसरे सवाल का जवाब पहले. नहीं, नड्डा को काम करने की पूरी आज़ादी मिलेगी और मदद भी. मोदी शाह का पिछले पाँच साल का दौर देखें तो आप पाएंगे कि जिसे ज़िम्मेदारी सौंपी उस पर पूरा भरोसा किया. फिर उसके कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करते. फिर वह मुख्यमंत्री हो या प्रदेश अध्यक्ष. अच्छे बुरे में उसके साथ बराबर खड़े रहते हैं. पहले सवाल का जवाब यह है कि फ़ैसला एक दिन या एक दो महीने में नहीं लिया गया है. यह दूरगामी रणनीति के तहत सोचा समझा फ़ैसला है.
दो नही चार लोगों की पार्टी हुई भाजपा
विपक्ष भारतीय जनता पार्टी को लगातार दो लोगों की पार्टी बताता रहा है. इसलिए विपक्ष के लिए अब शुभ संकेत नहीं है.भारतीय जनता पार्टी दो लोगों की नहीं बल्कि चार लोगों की पार्टी हो गई है विपक्ष के अनुसार. आप बिल्कुल ठीक समझ रहे हैं पहला नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ही है, दूसरा गृहमंत्री अमीत शाह तीसरा नाम भी आप जान ही गए हैं जेपी नड्डा लेकिन चौथा नाम नाम भी है जो विपक्ष की परेशानी का सबब बनने जा रहा है. और वो नाम है बीएल संतोष का.
जेपी नड्डा को अध्यक्ष बनाने का फ़ैसला काफ़ी पहले कर लिया गया था. इसीलिए राम लाल को हटाकर कर्नाटक के बीएल संतोष को राष्ट्रीय महामंत्री(संगठन) बनाया गया. संतोष नड्डा के बिल्कुल विपरीत स्वभाव वाले हैं. हार्ड टास्क मास्टर. नतीजे में कोई मुरव्वत नहीं करते. सख्ती उनकी रणनीति नहीं, स्वाभव का अंग है. नड्डा और संतोष की जोड़ी, एक दूसरे की पूरक है. जहां जेपी नड्डा के मृदु स्वभाव से काम नहीं चलेगा, वहां उंगली टेढ़ी करने के लिए बीएल संतोष हैं. अब संगठन का नीचे का काम वही देखेंगे. बीएल संतोष पर मोदी-शाह का नहीं संघ का भी वरदहस्त है. इसलिए भाजपा में एक नये दौर का आग़ाज़ होने वाला है. या यूं कहें कि हो चुका है. यदि विरोधियों की बात मान लें तो भाजपा अब चार लोगों की पार्टी हो गयी है.(लेख आपको कैसा लगा कमेंट जरूर कीजिए आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)


Add Comment