पॉलिटिकल खास विधानसभा

कड़वा है मगर सच है: आधी आबादी पर भरोसा कम, क्यों राजनीतिक पार्टियां करती हैं उपेक्षा? राजधानी में अपनों में बेगानी हुई आधी आबादी…

नई दिल्ली. किसी भी देश के बेहतर निर्माण में आधी आबादी की भूमिका महत्वपूर्ण है. कारण महिलाएं देश की आबादी का आधा हिस्सा हैं. लेकिन आधी आबादी का हक़ रखने वाली मातृशक्ति का राजनीति में प्रतिनिधित्व बेहद कम है. देश अपना 70 वां गणतंत्र मना रहा है. ये हमारे लिए खुश होने का विषय हो सकता है लेकिन आधी आबादी पर जब नज़र जाती है तो खुशियां अधूरी रह जाती हैं, निराशा जन्म ले लेती है और ऐसा इसलिए कि आज़ादी के इतने सालों के बाद भी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो पाई है. महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर रही हैं. लेकिन देश की दशा और दिशा निर्धारित करने वाले लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी चिंताजनक है. महिलाओं की भागीदारी कम होने से निश्चित ही उनके लिए योजनाओं के क्रियान्वयन में या फ़िर योजनाए बनाने में आनाकानी रहती है.

दिल्ली की सियासत में महिलाओं की भागीदारी, क्या मज़ाक़ है?

फ़िलहाल हम अगर बात करें दिल्ली की तो राजधानी की सियासत में महिलाओं की भागीदारी नाममात्र की ही दिखती है. जब से दिल्ली विधानसभा का गठन हुआ है तब से लेकर अब तक सबसे ज्यादा सत्ता महिलाओं के हाथों में रही, बावजूद इसके सदन में महिला विधायकों की संख्या गिनी-चुनी ही रही है. केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली की 70 विधानसभा वाली सीटों में केवल 6 महिलाएं ही प्रतिनिधित्व करती हैं. राज्य गठन से लेकर अब तक हुए छः चुनावों में कुल 31 महिलाएं शामिल रहीं. माने हिस्सेदारी की बात करें तो केवल 7.4 प्रतिशत.

क्या कहती हैं पार्टियां

जो आगे आंकड़े हम देने जा रहे हैं वह निश्चित रूप से महिलाओं के लिए लगने वाले नारों की ना केवल पोल खोल देगा बल्कि राजनीतिक मंशा को भी जग जाहिर करेगा. यह समझाने के लिए पर्याप्त होगा की महिलाओं के सम्मान की बात या उनकी बराबरी की बात केवल राजनेताओं के शब्दों तक सीमित है यानी शब्द भूमि से निकलकर राजनीतिक पार्टियां कर्मभूमि तक नहीं आना चाहती. इसके पीछे उनके अपने-अपने तर्क हैं.पार्टियों का तर्क होता है कि सरकार बनाने के लिए जिताऊ उम्मीदवारों को टिकट दिया जाता है.

आंकड़े जो हैरान कर देंगे

  • 6 चुनावों में केवल 4 महिला कैबिनेट मंत्री
  • इन छह चुनावों में केवल 4 महिलाएं ही कैबिनेट मंत्री बनी हैं। यह हाल तब है, जब 1998 से लेकर 2013 तक शीला दीक्षित की तीन बार सरकार रही. महिला मुखिया के होते हुए भी महिलाओं की समुचित भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो सकी. यहां तक वे अपने ही दल में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित नहीं करा सकीं.
  • पहली विधानसभा 1993 के चुनावों में 59 महिलाएं थी मैदान में.
  • 1993 के विधानसभा चुनाव में विभिन्न दलों से 59 महिलाएं मैदान में उतरी थीं, जिसमें से केवल 3 जीतीं.
  • 2008 के चुनाव में 81 महिलाओं ने अपनी किस्मत आजमाई, जिसमें 3 जीतीं.
  • 2015 के विधानसभा चुनाव में 66 महिलाएं चुनाव लड़ीं, लेकिन जीतकर विधानसभा में 6 पहुंचीं.
  • दिल्ली विधानसभा चुनाव में पिछली बार 5920490 महिला मतदाता थीं, जिनमें से 39 लाख से अधिक ने वोट किया था, जिनका प्रतिशत 66.49 रहा था.
  • इस बार 6635635 महिला मतदाता चुनाव में अपने मत का प्रयोग करेंगी.

इसलिए भी खास रहेगा महिलाओं के लिए चुनाव

2020 विधानसभा चुनाव महिलाओं के लिए इस बार महत्वपूर्ण होने जा रहा है. निर्भया कांड के आरोपियों की फांसी की सजा तय हो चुकी है. ऐसे में देखना होगा कि महिला अधिकारों और महिला सुरक्षा के मुद्दे का प्रतीक बन चुके निर्भया कांड से सबक लेते हुए क्या इस बार महिला जन प्रतिनिधियों पर आधी आबादी अपना भरोसा जताएगी?

अगर पूरे देश को भी देखा जाए तो राजनीतिक हिस्सेदारी के मामले में सभी पार्टियों का रवैया लगभग एक जैसा होता है. विधान सभाओं, लोकसभा और राज्यसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है. इसलिए आजादी के सात दशक बाद भी संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी नाममात्र की है.

कुलमिलाकर कहा जाए तो दिल्ली पढ़े लिखे, कारोबारी और नौकरी-पेशा करने वाले लोगों का शहर है. फिर भी महिला को जन प्रतिनिधि चुनने में यहां लोग परंपरावादी ढरे पर ही चलना पसंद करते हैं. ऐसे में महिलाओं को उनके अधिकार कब और कैसे मिलेंगे, या यूं कहें कहें कि वास्तविक भागीदारी कब होगी, यह अपने आप मे यक्ष प्रश्न है.

About the author

Prakash Pandey

Add Comment

Click here to post a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Follow us @ social media

Follow us @ Facebook

विविध