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सवाल : सीएए का विरोध करने वाले सच को स्वीकार क्यों नहीं करते, मुस्लिमों को सीएए से बाहर रखने की सबसे बड़ी पड़ताल

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का विरोध करने वालों का एक तर्क यह है कि यह कानून धार्मिक आधार पर भेदभाव करता है, क्योंकि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को बाहर रखा गया है। वामपंथी बुद्धिजीवियों का तर्क यह भी है कि अगर धार्मिक आधार पर भेदभाव ही आधार है तो पाकिस्तान के शियों और अहमदियों को भी इसके तहत भारत की नागरिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि ये दोनों संप्रदाय पाकिस्तान में सुन्नी बहुसंख्यकों द्वारा उत्पीड़न का शिकार हैं। ये तर्क इतने सरल लगते हैं कि अगर सुनने वाले को पूरे इतिहास की जानकारी न हो तो वह उनकी हां में हां मिला सकता है। सीएए के विरोध में सड़कों पर उतरने वाली भीड़ में अधिकतर लोग भारतीय इतिहास की इन जटिलताओं से अनभिज्ञ हैं। 1947 से पहले पाकिस्तान की मांग को लेकर चले आंदोलन में कुछ शिया नेताओं और अहमदिया समुदाय ने अग्रणी भूमिका निभाई थी। मुस्लिम लीग के प्रमुख नेताओं में शिया हस्तियां थीं। मोहम्मद अली जिन्ना का जन्म इस्माइली खोजा परिवार में हुआ था। इस्माइली खोजा एक शिया उप-संप्रदाय है। बाद में जिन्ना ने इथना अशारिया संप्रदाय को अपना लिया जो सबसे बड़ा शिया उप-संप्रदाय है। मुस्लिम लीग के दूसरे बड़े नेता महमूदाबाद के राजा मोहम्मद आमिर अहमद खान थे जो शिया थे और मुस्लिम लीग को चंदा देने वालों में काफी आगे थे। 1945 में उस समय की सबसे बड़ी शिया पार्टी शिया पॉलिटिकल कांफ्रेंस ने पाकिस्तान की मांग का विरोध किया था, पर कुछ शियों ने फिर भी जिन्ना पर भरोसा किया। यही स्थिति अहमदिया संप्रदाय की थी जिसने पाकिस्तान बनाने की लड़ाई सबसे आगे रह कर लड़ी। अहमदिया संप्रदाय के उस समय के सबसे बड़े इमाम हजरत मिर्जा बशीरुद्दीन महमूद अहमद ने 1946 के प्रांतीय एसेंबली चुनावों में मुस्लिम लीग के लिए यह कह कर प्रचार किया था कि मुसलमानों के मुस्लिम लीग को वोट देने का मतलब होगा पाकिस्तान की मांग के पक्ष में वोट देना। इमाम बशीरुद्दीन द्वारा नियुक्त उस समय के जाने-माने न्यायविद् और अहमदिया नेता मोहम्मद जफरुल्लाह खान ने सर रेडक्लिफ की अध्यक्षता में बने बाउंड्री कमीशन के सामने चार दिनों तक यह बहस की कि क्यों पंजाब के गुरुदासपुर जैसे शहर पाकिस्तान को मिलने चाहिए। जब गुरुदासपुर और पठानकोट जैसे सामरिक महत्व के जिले भारत के हिस्से में आए तो इमाम ने भारत से नफरत के चलते इस संप्रदाय के मजहबी केंद्र को पंजाब के गुरुदासपुर के कादियान से पाक के रबवाह में स्थानांतरित कर लिया। पाक पहुंचने पर उन्होंने कहा कि यह तो शुरुआत है और उनका सपना सारे इस्लामिक मुल्कों को पाक में मिलाकर इस्लामिस्तान बनाने का है। गुरुदासपुर, पठानकोट तो भारत को मिल गए, पर बाउंड्री कमीशन में अहमदिया नेताओं की लॉबिंग के चलते ननकाना साहब जैसा तीर्थ स्थल पाक को मिल गया।

पाकिस्तान में यह मान्यता है कि मौजूदा सेनाध्यक्ष जनरल कमर बाजवा के पिता फौज में रहते समय अपने सीनियर अहमदिया अधिकारी मेजर जनरल इफ्तिखार जंजुआ के प्रभाव में आकर अहमदिया बन गए थे। नवंबर 2019 में इमरान सरकार द्वारा जनरल बाजवा को दिए गए सेवा विस्तार के विरुद्ध पाक सुप्रीम कोर्ट में इस आधार पर भी एक याचिका दायर हुई कि जनरल बाजवा पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष नहीं हो सकते, क्योंकि वह अहमदिया हैं। हास्यास्पद यह है कि अहमदिया संप्रदाय के इमाम और उनके अनुयायी 1947 में पाकिस्तान को अपने सपनों का इस्लामिस्तान बनाने की पहली सीढ़ी मानते हुए भारत से वहां गए थे, पर 1974 आते-आते जुल्फिकार अली भुट्टो सरकार ने कट्टरपंथी मौलानाओं के प्रभाव में आकर संविधान में संशोधन के जरिये अहमदिया समुदाय को गैर मुस्लिम घोषित कर दिया। इसके बाद जनरल जिया उल हक के दौर से लेकर आज तक पाक फौज तालिबान, लश्कर-ए-झांगवी, सिपाह-ए-साहिबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे वहाबी और देवबंदी विचारधारा को मानने वाले आतंकी संगठनों को हथियार और ट्रेनिंग देती आई है। यही संगठन शियाओं और अहमदियों को गैर मुस्लिम बताकर हमले करते हैं। वास्तव में जो यह चाह रहे हैं कि पाकिस्तान के शिया और अहमदियाओं को सीएए में स्थान मिलना चाहिए उन्हें विश्व समुदाय से पाक में अपने लिए कुर्दिस्तान सरीखे एक सुरक्षित ठिकाने की मांग करनी चाहिए। विश्व समुदाय को भी यह देखना चाहिए कि आखिर पाकिस्तान में वहां के अल्पसंख्यकों के साथ शिया और अहमदिया सुरक्षित क्यों नहीं हैं?

जब पाकिस्तान का निर्माण चाहने वाले भारत से अलग हुए थे तो उन्हें जरूरत से ज्यादा जमीन भी दी गई थी और खजाने से उनके हिस्से की धनराशि भी। जिस दिन यह सब हुआ था उसी दिन भारत की पाकिस्तान चाहने वाले लोगों के प्रति जिम्मेदारी समाप्त हो गई थी। कोई भी बंटवारा होने के बाद बंटवारा कराने वाला दूसरों के हिस्से का उपभोग कैसे कर सकता है? अगर शिया और पाकिस्तान बनवाने की लड़ाई में आगे रहने के कारण खुद मोहम्मद अली जिन्ना से प्रशस्ति पत्र पाने वाले अहमदिया आज के पाकिस्तान में सुरक्षित नहीं हैं तो भारत की नागरिकता पर दावा जताने की जगह तार्किक और व्यावहारिक तो यह होगा कि ये समुदाय अपने लिए एक अलग देश की मांग करें। भला पाकिस्तान में एक और बंटवारे की मांग करने में क्यों हिचक होनी चाहिए? आखिर 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लाभाषी मुसलमानों ने भी तो अपने लिए बांग्लादेश बनवाया था। इस प्रकार के दो और हालिया उदाहरण भी हैं। 2011 में मुस्लिम बहुल सूडान से अलग होकर नीलोटिक ईसाई समुदाय के लिए दक्षिण सूडान की स्थापना हुई। इसी प्रकार इंडोनेशिया के कब्जे वाले तिमोर द्वीप का वर्ष 2002 में विभाजन कर मात्र 15000 वर्ग किमी में उत्पीड़न के शिकार ईसाई समुदाय के लिए प्रू्वी तिमोर नामक देश की स्थापना हुई।

(दिव्य कुमार सोती)
(लेखक काउंसिल फॉर स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं)

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