APARAJITA PANDEY
“ढोल , गंवार , शूद्र , पशु , नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी”
गोस्वामी तुलसीदास ने इन पक्तियों के जरिए एक बहुत ही बड़ी बात समझाने की कोशिश की है जो वर्तमान में प्रासंगिकता लिए हुई प्रतीत होती है. अगर हम ढ़ोल के सुर को नहीं पहचानते हैं तो उसे बजाते समय उसकी आवाज कर्कश होगी .. अतः उसके स्वभाव को जानना आवश्यक है. आज आधुनिकता के समय में भी पढ़े-लिखे समाज का एक ऐसा रूप सामने आना जिसमें महिलाओं के ‘मासिक धर्म ‘ होने का सबूत उनके वस्त्रों को उतारवा कर देना पड़ रहा है , यह सोचानीय , दयनीय व निंदनीय है. गुजरात के एक कॉलेज ‘श्री सहजानंद गर्ल्स इंस्टीट्यूट ‘ में 68 युवा महिला छात्रों को कॉलेज प्रशासन द्वारा जबरजस्ती उनके वस्त्र (अंडरवियर) को हटाने के लिए मजबूर किया गया ताकि साबित हो सके कि वो हर महीने आने वाली माहवारी नहीं कर रही , जिसे हमारे भारतीय समाज मे एक अछूत की नजरों से देखते हुए उनके प्रति दंडनीय दुर्व्यवहार भी किया जाता रहा है. आज के वक्त में भी कुछ लोग ऐसी सोच रखते हैं जो पूरे नारी जाती को अपमानित तो करती ही है, साथ ही भारतीय समाज के संस्कृति पर सवाल खड़ा करने को मजबुर भी करती है. कहा जाता है कि नारी ही नारी की सबसे बड़ी दुश्मन होती है और ये बात आज इस कॉलेज के महिला प्रधानाचार्या को देखते हुए साबीत हो सकता है कि सुशिक्षित लोग भी आज के वक्त वही पुरानी कुप्रथाओं का पालन कर रहे है जो बेबुनियाद है. 13 फ़रवरी को इस कॉलेज के छात्रानिवास (गर्ल्स हॉस्टल) में कुछ लडकियाँ अपने मासिक धर्म के वक्त भोजनालय ( मैस ) में घुस गईं और इसका अंजाम ये हुआ कि हॉस्टल रेक्टर ने कॉलेज के प्रधानाचार्या ‘ आनंदी बेन’ को शिकायत कर दिया कि महिला छात्रा संस्थान “धार्मिक मानदंडों” का उलंघन कर रही हैं.
‘अहमदाबाद मिरर ‘ से ये भी जानकारी मिली कि कॉलेज परिसर के भीतर और यहां तक कि साथी छात्रों को छूते हुए मंदिर में प्रवेश करने का आरोप लगाया गया है.
यह घटना महिलाओं के मूल अधिकारों का उलंघन कर रही है , जिसे आज भी महिलाओं को हर क्षेत्र में इस दकियानूसी सोच का सामना करना पड़ता है जो औरतों को औरत होने पर भी शर्मसार करने पर मजबुर करती है. श्री सहजानंद गर्ल्स इंस्टीट्यूट के विद्यार्थियों ने बताया कि ‘प्राधानाचार्या ने मासिक धर्म होने वाले छात्रों को अलग बैठने को कहा तब दो छात्रा अलग हो गईं , फिर भी कालेज के प्रधानाचार्या ने 68 छात्राओं को एक - एक करके शौचालय में भेज कर उनके अंडरगारमेंट्स हटवा कर मासिक धर्म होने का सबूत लिया.’ लड़कियों के आवाज उठाने पर कॉलेज प्रशासन ने उनको धमकाया तो कभी भावनात्मक व धार्मिक रूप से उनकी मानसिकता बदलने की कोशिश की. छात्राओं के माता- पिता को भी प्रधानाचार्या संग अध्यापको ने भी धार्मिक व पुरानी कहानियाँ सुना कर उनको राजी ( convenience) करने की कोशिश की. विद्यालय एक ऐसा पवित्र स्थल है जहां हर धर्म, हर विद्यार्थी को एक नज़र से देखा जाता है, जहाँ केवल एक ही धर्म दिखाई देता है और वह है ‘निर्पेक्ष शिक्षा’ किंतु आज - कल सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार एजुकेशन सिस्टम में देखने को मिलता है, जो हमारे नवयुवकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना हुआ और यह भी एक कारण है जिसके वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था व यहां की गरीबी तेज़ी से बढ़ोतरी कर रही है.
वर्तमान में भी विद्यालय या कॉलेज जैसे स्थानों पर अगर जाति - पाती, धर्म, लडका - लड़की, छुआ - छुत आदि देखा जाने लगा तो हमारे भारत के भविष्य को गड्ढे में जाने से कोई नहीं बचा सकता. पूरे भारत में सबसे ज्यादा शिक्षित राज्य केरल को माना जाता है जहाँ से हजारों डाक्टर, नर्स , इंजीनियर आदि निकलते हैं फिर भी ‘ सबरीमाला टेम्बल ‘ में औरतों का जाना वर्जित है. आज के वक्त सुप्रीमकोर्ट के द्वारा कहे जाने के बावजूद भी महिलाओं के मंदिर प्रवेश में बाधाएँ आ रही हैं, जिससे साफ - साफ झलकता है कि हमारा समाज कितना भी शिक्षित हो जाए मगर पुरूषसत्तात्मक सोच का उनके दिमाग से निकलने में अभी भी काफी वक्त लग जाएगा. हमें अपने समाज के हर एक व्यक्ति को महिलाओं के मासिक धर्म होने के पीछे का वैज्ञानिक तथ्य समझाना चाहिए जो हमारे भारत को सही मायने में एक शिक्षित देश बनाने में काम आएगा. महिलाओं के प्रति एक कदम उठाने से हमारा परिवार ही नहीं हमारा देश भी शिक्षित हो सकता है. कहते हैं कि परिवार की एक महिला भी पढ़ - लिख जाए तो पूरा परिवार शिक्षित हो जाता है. महिलाओं के प्रति ऐसे व्यवहार और रवइए से उनके मनोबल को ठेस पहुंचता है और वो खुद को कोसने और ताना देने लगती हैं जिससे सिर्फ एक लडक़ी पर ही नहीं बाल्की आने वाली पीढ़ी पर भी संकट के बादल छा जाते हैं.
‘गुजरात महिला मंच ‘ने इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया जताते हुए कहा “जबकि कई कार्यकर्ता समूह मासिक धर्म से जुड़ी वर्जनाओं के खिलाफ़ लड रहे हैं ,ऐसी घटनाएं फिर से महिलाओं के प्रति दुर्भावनापूर्ण और अवैज्ञानिक विचार को और अधिक मजबूत करती हैं. ” शास्त्रों के लिकबद्घ तथा दिग्भ्रमित विचारों के कारण ही समाज भी दिशाभ्रम का शिकार है. अशिक्षा और अंधविश्वास के कारण ही शास्त्रीय पूर्वाग्रह तथा पंडिताऊपन द्वारा समाज को भय दिखाकर अपने निजी हित साधने में कुछ लोगों की मात्र सोची-समझी रणनीति होती है. शास्त्र लिखित बातें अन्तर्दृष्टि से रहित भक्तिकाल में भी अंधविश्वासो को जन्म देने वाली रहीं. इन बातों में अनुभुति की प्रमाणिकता का अभाव रहा. कबीर दास ने शास्त्रों को चुनौति देते हुए लिखा है:-
” तेरा मेरा मनवा कैसे इक होई रे। तू कहता कागद की लेखी , मै कहता आंखिन देखी । । मैं कहता सुरझावन हारी ,तू राखे उरझाई रे।।”
जगत्त यदि नश्वर है तो सांसारिक प्रपंचों का शिकार होना और उसी के अनुरूप जीवन यापन करना अंधविश्वास को जन्म देता है. गुजरात के कॉलेज में हो रहे घटना पर ‘स्वामी जी कृष्ण स्वरूप दास जी ‘ का उपदेश आज - कल चर्चा का केंद्र बनी हुई है, जो अंधविश्वास व कुप्रथाओं को जन्म देने वाली भड़काऊ प्रतीत हो रही है. गुजरात के धर्मगुरू का कहना है कि:-
‘अगर माहवारी के दौरान औरत खाना बनाती है तो उसका अगला जन्म कुतिया के रूप में होगा और अगर उसके हाथ का बना खाना मर्द खाता है तो उसका पुनर्जन्म बैल के रूप में होगा.’ ये भड़काऊ व विवादित उपदेश देते हुए उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी को उनका नज़रिया पसंद नहीं है तो इसकी उन्हें परवाह नहीं मगर ये शास्त्रों में लिखा है.
उनके इस उपदेश से लोगों में और खास कर महिलाओ में अपने मुल अधिकारों को सही रूप से पाने के लिए खलबली मची हुई दिखाई दे रही है. इस तरह के उपदेश आधुनिक महिलाओं के अंदर हीन भावना पैदा करती हैं और इन कुप्रथाओं पर आवाज उठाने को मजबूर करती हैं, जिससे केवल एक या दो परिवार ही नहीं बल्कि पूरा देश प्रभावित होता है.
सवाल जिसका जवाब आना चाहिए
प्राचीन काल से ही भारत औरतों के सम्मान और निष्ठा का केन्द्र बना हुआ है जहाँ भारत उनके अस्तित्व को लेके प्रश्नचिन्ह रहा है. जहां भारत में नारी को देवी-देवताओं के स्वरूप पुजा जाता है वहीं दूसरी ओर उसके चरित्र और अस्तित्व पर प्रश्न उठते हैं. जहाँ भारत में स्त्री के सम्मान को लेके महाभारत और रामायण जैसी गाथाएं लिखी गयी, जहां हमारे पुराण गाथाओं पृथ्वी को ‘ माँ ‘ और भारत को ‘ माता ‘ कह के सम्मान दिया वहीं स्त्री के पवित्रता पर आज भी प्रश्न उठते हैं जो कि निंदनीय है. क्योंकि जब सारी सृष्टि ही स्त्रीलिंग है तो उसकी पवित्रता पे सवाल उठाने का प्रश्न कैसे पनप सकता है. हम जिस युग में हैं वहाँ हमें कदम से कदम मिलाकर भारत को एक नए आयाम देने के बजाय हम वही पुराने कुरीतियों में विलीन हैं जो सदियों से चला आ रहा है और उसे हम सर्वनाश की ओर ढकेल रहे हैं. इससे पहले कि ये सर्वनाश हमें खा जाए हमे अपने विचार बदलने पड़ेंगे और उन कुरीतियों को तोड़ने पड़ेंगे जो समाज में किसी पीड़ के रोग की तरह समाज को खोखला कर रही है.


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