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बीच बहस में: आसान नहीं होता किसी राजनैतिक दल का समर्पित समर्थक होना

खैर हमे क्या लेना देना है इन सब मामलों से ! लेकिन बहुत आश्चर्य होता है कि कैसे नेताओं का अचानक से हृदय परिवर्तन हो जाता है. खैर ये नेताओं का व्यक्तिगत मामला है लेकिन बेचारे समर्थकों के बारे मे सोचकर बहुत दुख होता है कि कैसे बिना किसी मुनाफे के बेचारों को तुरंत अपना हृदय परिवर्तन करना पड़ता है.

HIMANSHU PANDEY

किसी राजनैतिक दल के समर्पित समर्थक होने का चलन भारत मे नया नहीं है. आज़ादी के बाद से ही लोग राजनैतिक समर्थकों के गुटों मे बट गए थे – कुछ दक्षिणपंथी, कुछ वामपंथी और बाकी सभी सेंटर वाले मतलब कांग्रेसी . पहले ये गुट प्रायः चाय और पान की दुकान मे राजनैतिक बहस करते हुये मिल जाते थे और इनकी दलीलें सुनकर कोई भी आसानी से ये मान सकता था कि इन्हे सरकारों के फैसलों की पूरी अंदरूनी जानकारी है.
सोशल मीडिया के आने के बाद से इन समर्थकों की संख्या मे ज़बरदस्त उछाल आया और आज ये हालत है कि अधिकतर लोगों के सोशल मीडिया पोस्ट को देखकर उनकी राजनैतिक प्रतिबद्धता का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है. लोग अपने पसंदीदा नेता और राजनैतिक दलों के समर्थन मे तरह–तरह के सच्चे-झूठे पोस्ट डालते रहते हैं.

“अब ना रहे वो पीने वाले, अब ना रही वो मधुशाला” – हरिवंशराय बच्चन

लेकिन अब हालात पहले जैसे नहीं रहे. अब ना तो राजनैतिक दलों की मुद्दों के प्रति पहले जैसी प्रतिबद्धता रह गयी है, ना ही नेताओं की राजनीतिक दलों के प्रति पहले जैसी प्रतिबद्धता रह गई है और ना ही समर्थकों की नेताओं के प्रति. अब राजनेता आसानी से पाला बदलकर एक पार्टी से दूसरी पार्टी मे चले जाते हैं और कल तक जिसे गाली देते थे उसकी तारीफ करने मे लग जाते हैं तथा जिसकी तारीफ करते होते थे उसे गाली देने लग जाते हैं जैसे कि 2014 चुनाव से पहले कई कट्टर कांग्रेसी बीजेपी मे शामिल हो गए और कल तक जिस पार्टी को ईमानदार बताते थे अचानक से बेईमान बताने लगे.
ऐसे हालातों में राजनैतिक समर्थकों के लिए सबसे बड़े असमंजस वाली स्थिति होती है. नेताओं और दलों को तो अपनी प्रतिबद्धता बदलने का इनाम मिल जाता है लेकिन बेचारे समर्थकों को कुछ मिलता भी नहीं और अपने पुराने सोशल मीडिया पोस्ट को भूलकर नए विचारों वाले पोस्ट करने पड़ते है. सच मे बड़ा मुश्किल होता होगा अपनी अंतरात्मा को मारकर नए एजेंडा के साथ चलना. विश्वास नहीं होता तो पेश हैं दो ताज़ा तरीन उदाहरण:

  1. अब एक साल पहले तक जो लोग 1857 की क्रांति को लेकर काँग्रेस वाले सिंधिया जी की मिट्टी-पलीत किया करते थे, आज उन लोगों को उन्ही सिंधिया जी मे बड़ा राष्ट्रवादी नज़र आने लगा. शायद उन बेचारों को 1857 वाली बात करते वक़्त मालूम नहीं था की राजमाता सिंधिया इन्ही ज्योतिरादित्य की दादी थीं और वसुंधरा राजे सिंधिया इनकी बुआ. और जो कांग्रेसी समर्थक अभी तक सिंधिया जी का बचाव करते थे, अब बीजेपी वालों को उनके पुराने 1857 वाले पोस्ट याद दिलाने लगे हैं और अपने पुराने लाडले सिंधिया जी मे कमियाँ निकालने लगे हैं.
  2. अच्छा अगर आपको पहले वाकये मे मज़ा नहीं आया तो पेश है दूसरा वाकया जो बिलकुल भी राजनैतिक नहीं है लेकिन दर्शाता है कि कैसे एक बड़े आदमी के प्रति लोगो के विचार बदल गए हैं. जब गोगोई साहब माननीय सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने थे तब एक दल के समर्थक उनपे कई अनाप सनाप आरोप लगाया करते थे. अचानक से आरोप लगाने वाले उनकी तारीफ करने लगे हैं और जो पहले उनका बचाव करते थे अब स्वयं उन्हें शक की निगाह से देखने लगे हैं.

खैर हमे क्या लेना देना है इन सब मामलों से ! लेकिन बहुत आश्चर्य होता है कि कैसे नेताओं का अचानक से हृदय परिवर्तन हो जाता है. खैर ये नेताओं का व्यक्तिगत मामला है लेकिन बेचारे समर्थकों के बारे मे सोचकर बहुत दुख होता है कि कैसे बिना किसी मुनाफे के बेचारों को तुरंत अपना हृदय परिवर्तन करना पड़ता है.

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Prakash Pandey

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