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बोल वचन खास

सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा एक अनोखा मामला, आप भी जानिए क्या मांग की गई है?

कोरोना वायरस के संक्रमण काल में जीवन को बचाने की ज़िद जारी है. केंद्र सरकार से लेकर सभी राज्य और आम नागरिक तक प्रयासरत हैं. कोरोना वायरस की उत्पत्ति कैसे हुई इस पर भी शोध चल रहे हैं. लेकिन अभी तक कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है. इसी बीच सर्वोच्च न्यायालय में एक अनोखा मामला पहुंच गया है. एक पीआईएल डालकर दवा किया गया है की मांस खाने वालों की आदतों के कारण शाकाहारी लोगों का जीवन जीना मुश्किल हो गया है. सभी को कोरोनावायरस संकट का सामना करना पड़ रहा है.
दरअसल शाकाहारी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हुए विश्व जैन संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. याचिका में याचिकाकर्ताओं ने घरेलू और जंगली जानवरों को केवल स्वाद में बदलाव का जरिया माना है और ऐसे लोगों पर रोक लगाने की मांग की है जो जानवरों को स्वाद के लिए खाते हैं. यह भी दावा किया गया है कि ऐसे व्यक्तियों ने शाकाहारियों का जीवन भी संकट में डाल दिया है और मानवता के लिए खतरा बन गए हैं.

मांस/मछली पर रोक लगाने की मांग

लाइवलॉ डॉट इन के मुताबिक यह अत्याचार और बर्बर आदत कुछ चीजें स्वाद बदलने के लिए है जो पशु प्रेमियों के अनुच्छेद 21 के तहत उन मूल अधिकारों की जड़ों पर चोट है जो जीवन के अधिकार की पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देते हैं. संगठन ने अनुच्छेद 51a जी ( 42 में संवैधानिक संशोधन में) सम्मिलित का हवाला देते हुए कहा है कि प्रत्येक नागरिक के लिए यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करें और जीवन जीने के लिए जीव पर दया करें. विश्व जैन संगठन केंद्र और राज्य सरकारों से पशु/मछली पक्षियों या मुर्गी के व्यापारी और वध पर बैन लगाने की मांग की है. इस मांग में खासतौर से मुर्गे को हलाल करने के तरीकों के साथ साथ किसी भी बूचड़खाने से खरीदे गए मांस के निर्यात पर रोक लगाने की मांग की गई है.

गृह मंत्रालय के आदेश पर जैन संगठन ने की रोक की मांग

याचिका में केंद्रीय मत्स्य पशुपालन और डेयरी मंत्रालय द्वारा जारी सर्कुलर को चुनौती मिली है जिसे मांस की खपत को बढ़ावा देने के संबंध में जारी किया गया था. याचिका में कहां गया है कि केंद्रीय मंत्रालय ने मीट लॉबी के दबाव के आगे घुटने टेक दिए और समय से पहले सर्कुलर जारी किया जबकि वायरस फैलाने में पशु प्रजातियों की भागीदारी को अस्वीकार करने के लिए कोई निर्णायक शोध मौजूद नहीं है. जब पूरी दुनिया रिसर्च और उसके परिणाम इंतजार में है तो बिना किसी आधार के मीट लॉबी के दबाव के कारण बिना किसी प्रमाणित शोध के मांस की खपत को बढ़ावा देने के लिए जारी किया गया आदेश समाज के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

याचिका में यह भी दिए गए तर्क

रिसर्च का हवाला देते हुए पीआईएल में कहा गया है कि 2002 के बाद से कोरोनावायरस के छह अलग-अलग रूपों के बाद कोविड-19 सातवें प्रारूप का वाहक जानवर है जहां से वायरस मनुष्यों में आया.
बता दें कि कोरोनावायरस के फैलने में जानवरों की क्या भूमिका है? इस पर कोई रिसर्च नहीं हुआ है.

संगठन ने की डब्ल्यूएचओ की सराहना

विश्व जैन संगठन ने डब्ल्यूएचओ के प्रयास की सराहना की जिसमें डब्ल्यूएचओ ने सभी देशों से कहा है कि वह जानवरों से मनुष्यों में ट्रांसमिशन के जोखिम को कम करने का प्रयास करें. फरवरी 2020 में डब्ल्यूएचओ ने कोरोनावायरस के बढ़ने में जानवरों की प्रजातियों की भूमिका की पहचान करने के लिए एक आपातकालीन बैठक आयोजित की थी.

आईसीएमआर से अपील

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के लिए सर्वोच्च न्यायालय से निर्देश देने की मांग याचिकाकर्ता ने की है. उन्होंने कहा है कि वह डब्ल्यूएचओ के आह्वान के अनुसार कोरोनावायरस के बढ़ने और फैलने में पशु प्रजातियों की भूमिका की पहचान करें. याचिका में केंद्र को एक स्वतंत्र गैर सरकारी उच्च स्तरीय अनुसंधान समिति का गठन करने के निर्देश देने की मांग भी की गई है.

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सर्वोच्च न्यायालय का इस पूरे मामले पर क्या निर्णय आता है? जानवरों के पद पर रोक लगाने वाली याचिका मीट के शौकीन लोगों के लिए ठीक नहीं है लेकिन याचिका के अनुसार जनजीवन को बचाने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है. ऐसे में जानवरों और मनुष्य के बीच में ट्रांसमिशन पर भी रिसर्च होना जरूरी है.

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Prakash Pandey

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