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कोरोना काल में लोगों को डिप्रेशन से बचाने वाली डॉ सरोज संक्रमण में दवा को भी तरसीं, रोगी का फ़ोन खोल दी पोल

Dr Saroj Rathore File pic

उत्तर प्रदेश का कानपुर. सन 2020 में वैश्विक महामारी कोरोना से डिप्रेशन में आने वाले लोगों को बचाने वाली और निशुल्क काउंसलिंग करने वाली डॉक्टर सरोज राठौर व्यवस्था के आगे हार गयीं. 11 अप्रैल को गंभीर हालत के बाद रात 1:00 बजे डॉक्टर सरोज राठौर की मौत की खबर सामने आई. लोगों का हौसला बढ़ाने वाली सरोज राठौर सरकारी अस्पताल में मरीजों की दुर्दशा से चिंतित थी. डॉक्टर सरोज राठौर ने मौत से पहले सखी केंद्र की महामंत्री नीलम चतुर्वेदी को फोन कर मरीजों की दुर्दशा पर अपनी चिंता भी जाहिर की थी.
सखी केंद्र की कार्यकारी बोर्ड सदस्य और किदवईनगर महिला महाविद्यालय में मनोविज्ञान से सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष डॉ सरोज राठौर शहीद मुनेंद्र सिंह भदोरिया की पत्नी थीं. भदोरिया सन 1965 में भारत चीन युद्ध के दौरान शहीद हो गए थे. पूर्व कैबिनेट मंत्री विद्यावती राठौर की भतीजी और समाजसेवी सरोज राठौर कोरोना काल में लॉकडाउन की वजह से डिप्रेशन यानी अवसाद ग्रस्त लोगों की निशुल्क काउंसलिंग के बाद चर्चा में आई थीं.
संवाद न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक सखी केंद्र की महामंत्री नीलम चतुर्वेदी ने बताया कि डॉक्टर सरोज राठौर की तबीयत 8 अप्रैल को खराब हुई थी. 10:00 बजे उन्हें मधुलोक अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां उनको आईसीयू में रखा गया. 9 अप्रैल की सुबह सरोज राठौर कोरोना पॉजिटिव पाई गई. उसी रात 12:00 बजे उन्हें हैलट में भर्ती कराया गया. 10 अप्रैल को वह बात करती रहीं. अस्पताल में दवा तक न मिलने पर डॉ सरोज ने एक रोगी के मोबाइल नीलम चतुर्वेदी को फोन किया था. उन्होंने इलाज में लापरवाही की पोल खोली थी. 11 अप्रैल को हालत गंभीर होने के बाद रात 1:00 बजे उनकी मौत हो गई.
सवाल उठ रहा है सेवा भाव और समर्पण के साथ जनमानस को सहयोग करने वाली डॉ सरोज जैसी महिला के साथ भी यदि दवा और व्यवस्था को लेकर परेशानियां आई तो आम आदमी की बिसात ही क्या होती है.
सरकारी अस्पतालों में लापरवाही और प्राइवेट अस्पतालों का मरीज को व्यापारिक दृष्टिकोण से देखना कोई नई बात नहीं है. सरकारी अस्पताल को लापरवाही निजी अस्पतालों के व्यापार को बढ़ावा देता है. डॉ मरीज़ के संवेदना के स्थान पर शिकार की तरह व्यवहार करते हैं. सूचनाएं ऐसी भी मिली कि रोगियों को कोविड-19 अस्पतालों में उनके परिजनों के हवाले कर दिया जाता है. अटेंडेंट तो छोड़िए व्हील चेयर पर बैठा कर बुजुर्ग और कमजोर मरीजों को एंबुलेंस तक पहुंचाने की जहमत भी अस्पताल प्रशासन नहीं उठाता है और मरीज के परिजनों को मरीज को सौंप दिया जाता है. जहां एक ओर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार अपनी टीम 11 के साथ बैठक कर कोरोना पर किसी भी तरह की लापरवाही से बचने की हिदायत दे रहे हैं, मरीज़ों के लिए समर्पण और सेवा भाव के साथ व्यवहार करने के निर्देश दे रहे हैं वहीं व्यवस्था में बैठे पुराने खिलाड़ी कागज़ी कार्रवाई दिखाकर व्यवस्था को हकीकत से दूर मुख्यमंत्री को दुरुस्त दिखा रहे हैं. सरकार और प्रशासन की ओर से दावे किये जाते हैं कि कोरोनावायरस की संपर्क में आने से बचना चाहिए वहीं संक्रमित मरीज के संपर्क में पूरे परिवार को झोंक दिया जा रहा है. यह व्यवस्था पर बड़ा सवाल है.
सवाल यह भी है कि अधिकारियों का महिमामंडन करने वाला मीडिया धरातल पर अपने कर्म से काफी दूर पहुंच गया है. अच्छे अधिकारियों की कमी नहीं है लेकिन अच्छे अधिकारियों और प्रदेश के मुख्यमंत्री तक सच्चाई का पहुंचना जरूरी है. दुर्भाग्यवश लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में अपनी जड़ें काफी मजबूत कर चुके कुछ मीडिया घराने इन घटनाओं को तरजीह नहीं देते.

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Prakash Pandey

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