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बोल वचन खास

व्यंग्य : बारूदी बुद्धजीवियों के दौर में

ई.ललित शौर्य: लेखक,साहित्यकार, समीक्षक व अखिल भारतीय सहित्य परिषद उत्तराखंड के प्रदेश महामंत्री हैं. मूलतः उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद के मुवानी गांव से आते हैं. लेखक ने कम उम्र में बड़े कीर्तिमान स्थापित किये हैं. आपके लेख प्रभाव शाली और प्रेरक होते हैं साथ ही समाज में बदलाव में अहम भूमिका निभाते हैं.

हमारा देश बुद्धिजीवियों से अटा पड़ा है. हर गली-महोल्ले में आपको थोक के भाव बुद्धिजीवी मिल जाएंगे. यहां चारों तरफ बुद्धिजीवियों की फसल लहलहाती हुई देखी जा सकती है. यह देश बुद्धिजीवियों के बल पर ही चल रहा है, ऐसा हर एक बुद्धिजीवी को लगता है.

बुद्धिजीवी ही एक ऐसा प्राणी है जो चौबीसों घंटे सोच-सोच कर मोटा हुवा जाता है. उसकी तोंद बाहर की ओर फूट पड़ती है, चेहरे में अमेरीकन एप्पल की तरह लालिमा पुती हुई दिखाई देती है. बुद्धिजीवी भाँति-भाँति प्रकार के होते हैं. ठीक उसी प्रकार उनका चिंतन भी डिफ्रेंट टाइप का होता है. बुद्धिजीवियों के अपने-अपने खेमें होते हैं और उनकी बुद्धि उसी खेमे के चारों ओर चारा चुगती नजर आती है. वो अपने खेमे से बाहर सोचने का दुस्साहस कभी नहीँ कर पाते. ये बुद्धिजीवी अगड़े, पिछड़े, तगड़े, पतले, छोटे, बड़े सभी किस्म के होते हैं. ये प्रायः गाँव ,गली चौराहों से लेकर अखबारों और टी. वी डिवेट तक सभी जगह बिखरे पड़े हैं. अगर आज के दौर में बंदे के पास कोई काम ना हो तो वो बैठे-बैठे बुद्धिजीवी बन बैठता है. दो चार किताबों के अंदर सिर ठूंस कर , पाँच-छ: घटनाओं और उनके सन्दर्भों को रटकर उसके मुखमंडल में बुद्धिजीवी वाला घमण्ड तैरने लगता है. बुद्धिजीवी प्रायः अच्छे और बुरे दोनोँ प्रकार के होते हैं. यहाँ अच्छे और बुरे इसलिए कहा गया है कि कुछ बुद्धिजीवी भयंकर वाले होते हैं. जिनकी बुद्धि से विध्वंस का जिन प्रकट होता है. जिनकी वाणी से विषैले शर्प बाहर की ओर मुंडी निकालते हैं,साथ ही भयंकर जहर उगलते हैं. अच्छे वाले बुद्धिजीवी सृजन के पक्षधर होते हैं. वो चारों ओर मुस्कुराता हुवा जीवन देखना चाहते हैं. मानवता के फूलों की सुगंध का अनुभव करना चाहते हैं.

डिफ्रेंट टाइप वाले बुद्धिजीवी काम भी डिफ्रेंट करते हैं. इनकी बुद्धि में हमेशा विरोध का कीड़ा कुलबुलाते रहता है. इनकी दृष्टि में नकारात्मकता का मोतियाबिंद होता है. इनके मंसूबे बारूदी होते हैं. इसलिए इन कथित बुद्धिजीवियो को बारूदी बुद्धिजीवी कहा जाने लगा है. ये शब्द मीडिया में खूब उछल -कूद मचाये हुए है. अब तक हमने केवल बारूदी सुरंग, बारूदी बम जैसे शब्द सुने थे पर अब बारूदी बुद्धिजीवियों का प्राकाट्य हो चुका है. इन बारूदी बुद्धिजीवियों के लक्षण रावण से मेल खाते हैं, कुछ लोग इन्हें रावण के वंश का ही मानने लगे हैं. जिस तरह रावण के पास बुद्धि तो थी पर उसका जोर विध्वंस की तरफ था. अनीति और अत्याचार उसको प्रिय थे. ठीक उसी प्रकार आज के ये बुद्धिजीवी बड़े विषैले हैं, देश तोड़ने का मंसूबा इनके अंदर कुंडली मारकर बैठा हुवा है. लादेन को आधुनिक बारूदी बुद्धिजीवियों का बाप कहा जा सकता है. ये बात मैं नहीँ कह रहा बल्कि समाज में व्याप्त बुद्धिजीवियों की ही एक जमात बोल रही है. क्योकिं बोलना, अनुसंधान करना तो बुद्धिजीवियों का ही काम है.
बारूदी बुद्धजीवियों के दौर में हम सभी को बहुत सतर्क रहने की जरूरत है. पता नहीँ कौन सा बुद्धिजीवी किस बात पर कहाँ से फट पड़े. और सामने वाले की धज्जियां उड़ा दे. वैसे भी बारूदी बुद्धिजीवी धज्जियां उड़ाने में एक्पर्ट होते हैं. ये कानून की, सामाजिक ताने-बानों की, देश की अखण्डता की धज्जियां समय-समय पर उड़ाते रहते हैं. तो बाबू चलना संभल-संभल के….बचना, जरा बचना बारूदी बुधिजीवियों से.

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Prakash Pandey

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