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व्यंग्य : अपने अपने बसंत

ललित शौर्य:लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और अखिल भारतीय साहित्य परिषद के उत्तराखंड प्रदेश के महामंत्री हैं.

वसन्त जब आता है, मन बौरा जाता है. बन्दा पगला जाता है. क्या करे कुछ नहीं सुहाता. सब कुछ मदमस्त सा फील होने लगता है. दिल के अन्दर गुदगुदी सी मचने लगती है. नौजवानी में वसन्त अधिक सुहाता है, अधिक रिझाता है. कभी-कभी पापड़ बेलने पर भी मजबूर कर देता है. नौजवान, बसंत आते-आते प्रियसी की वासंती चूनर ओढ़कर गुटर-गू करना चाहता है.उसे सारे संसार का सुख प्रियसी के साथ चैटिंग करने से मिलने लगता है. वो फेसबुक पर बार-बार प्रियसी की पुरानी पोस्ट्स पर कमेन्ट मारकर उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है. मैसेंजर पर जब उसे हार्ट वाले इमोजी का रिप्लाय आता है तो उसका बसंत धन्य हो उठता है.
वसंत भूतपूर्व नौजवानों उर्फ़ बूढ़ों का भी आता है. पर उनका वसंत पुरानी कोट की तरह एक जगह टंगा हुवा अपना चरमोत्कर्ष याद कर रहा होता है. वो अपनी हिचकोले खाती जवानी की नाव को याद कर मूंछों पर ताव देते नजर आते हैं. बुजुर्गों को अपना बसंत नकली दाँतों के सेट्स और दवा की गोलियों में भी नजर आता है. जिसके सहारे वो आगे और कई बसंत देखने के सपनेसंजोये लेटे पड़े हैं. बसंत सबको भाता है, चाहे बंदा पड़ा हो या अपने पैरों पर खड़ा हो.
कवि टाइप के लोग मधुमास आते ही उछलने लगते हैं. ये उनका फेवरेट टाइम होता है. इस समय उनके भीतर थोक के भाव कवितायें फूटती हैं. उनकी कलम की स्याही से कविताओं की बाढ़ आ धमकती है. ये समय श्रृंगार रस के कवियों के लिए बेहतरीन माना जाता है. इस समय श्रृंगार रस का कवि ऐसी-वैसी कवितायें लिखते हुए भी पकडे जा सकते हैं. उनके अन्दर का सारा श्रृंगार कविताओं से चूता हुवा महसूस किया जा सकता है.
नेताओं का वसंत सरकार हो तो पाँचों साल रहता है. वो पाँच साल तक उचकते, दमकते, उछलते, बौराए से पाए जाते हैं. सत्ता और कुर्सी ही उनके बसंत की कुंजी है. अगर ये कुंजी उन्होंने हथिया ली तो फिर मधुमास ही मधुमास. लेकिन सत्ता जाते ही पतझड़ छाने लगता है. फिर ऋतुराज आये या कोई और अगले पांच साल तक उन्हें बसंत फूटी आँख नहीं सुहाता.
उधर गृहणियों का बसंत सस्ते सिलेंडर, सस्ते दाल-चावल के भाव में छुपा है. बच्चों का बसंत तो आजकल पबजी गेम्स के अन्दर घुसा पड़ा है. माँ-बाप का बसंत बच्चे के रिपोर्ट कार्ड में होता है. अगर रिपोर्ट कार्ड अच्छे मार्क्स से भरा पड़ा हो तो बसंत ही बसंत. अगर इसके विपरीत कुछ दिखाई दे तो अरमानों का पतझड़ शुरू हो जाता है. सरकारी ऑफिस में कर्मचारियों को वसंत तभी दिखाई देता है जब फ़ाइल पर नगद नारायण धर कर सरकाई जाए. जनता जनार्दन और वोटर्स को चुनावी वादों और घोषणा पत्रों में भी बसन्त दिखाई देता है.जनता उसी छद्म वसंत के पीछे-पीछे दौड़ती भागती दिखाई देती है. कभी-कभी बसंत का एहसास चुनावों के बाद होने वाली कर्जमाफी से भी होता है.
खैर वसंत तो आ ही चुका है. कोई माने या ना माने. कोई महसूस करे या न करे. यहाँ सबके अपने-अपने बसंत हैं. और वसन्त के मायने भी हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हैं.अब किसको कौन सा वसंत भाता है ये उसका अपना व्यक्तिगत विषय है.फिलहाल एन्जॉय द वसन्त.

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Prakash Pandey

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