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दिल्ली विधानसभा चुनाव: अपराधियों से किसी को परहेज़ नही, भाजपा टॉप पर कांग्रेस भी पीछे नही

दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपराधियों का भी बोलबाला रहा है. अपराध के खिलाफ आवाज़ मुखर करने वाली पार्टियों की हकीकत अलग रही है. क्राइम कंट्रोल के नाम पर कई राज्यों में सत्ता तक पहुंचने वाली और दिल्ली विधानसभा चुनाव में एड़ी चोटी का जोर लगाने वाली भाजपा अपराधियों को टिकट देने में प्रदेश में पहले स्थान पर रही है वहीं कांग्रेस ने दूसरा स्थान बरकरार रखा है. एडीआर और दिल्ली इलेक्शन वॉच का सर्वे, दिल्ली चुनाव में आपराधिक मामले वाले उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी

चुनावों की हर गतिविधि पर नज़र रखने वाली संस्था एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस (एडीआर) ने सनसनीखेज आंकड़ा पेश किया है. एडीआर के मुताबिक किसी भी राजनीतिक पार्टी को अपराधियों से कोई समस्या नही है. एडीआर और दिल्ली इलेक्शन वॉच के मुताबिक दिल्ली चुनाव में आपराधिक मामलों के उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी है.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपराधियों का भी बोलबाला रहा है. अपराध के खिलाफ आवाज़ मुखर करने वाली पार्टियों की हकीकत अलग रही है. क्राइम कंट्रोल के नाम पर कई राज्यों में सत्ता तक पहुंचने वाली और दिल्ली विधानसभा चुनाव में एड़ी चोटी का जोर लगाने वाली भाजपा अपराधियों को टिकट देने में प्रदेश में पहले स्थान पर रही है वहीं कांग्रेस ने दूसरा स्थान बरकरार रखा है. 2008 के विधानसभा चुनाव में 790 उम्मीदवारों में से 111 उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों का खुलासा किया था जबकि 2013 में कुल 796 उम्मीदवारों में से 129 प्रत्याशियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे. वहीं 2015 में 673 कैंडिडेट्स में से 114 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे.

अगर दलगत के लिहाज से देखा जाए तो 2008 में आपराधिक मामले वाले सबसे अधिक कांग्रेस के 67, भाजपा के 63, बसपा के 64, जदयू 11, सपा 31, लोजपा 37, राकांपा 15, शिवसेना 8 और अन्य के 494 उम्मीदवार थे. वहीं गंभीर आपराधिक मामले वाले उम्मीदवारों की संख्या 2008 में सबसे अधिक 22 भाजपा में थी और सबसे कम जदयू एक और शिवसेना के एक थे.

एडीआर के मुताबिक 2013 में अपराधियों को उम्मीदवार घोषित करने में भाजपा पहले नम्बर पर थी.सबसे अधिक आपराधिक मामलों में भाजपा के 31, कांग्रेस के 15, बसपा के 14 और जदयू के आठ उम्मीदवार मैदान में थे. इनमें सबसे कम आप के पांच और शिवसेना के दो उम्मीदवार थे. जबकि, 2015 में भाजपा के 27, कांग्रेस के 21, बसपा के 12, आप के 23 और शिवसेना के चार उम्मीदवार आपराधिक छवि के थे. यहां बता दें कि विश्लेषण के लिए, दिल्ली में 2008, 2013 और 2015 में हुए विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों द्वारा प्रस्तुत हलफनामों को आधार बनाया गया है.

समय के साथ जनता ने बदला मिज़ाज, अपराधियों और करोड़पतियों के जीत का औसत हुआ कम

दिल्ली के मतदाताओं ने समय के साथ साथ जवाब भी देना शुरू किया . इसके परिणाम स्वरूप अपराधियों और करोड़पतियों के जीतने की संभावना में लगातार गिरावट दर्ज की गई है. दिल्ली विधानसभा में घोषित आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवार के जीतने की संभावना 2008 में 26% थी, जो 2015 के विधानसभा चुनावों में घटकर 21% रह गयी. वहीं, 2008 में 68 में से 47 (69%) करोड़पति 2013 में 70 में से 51 (73%) और 2015 में 70 में से 44 (63%) विधायक करोड़पति थे.

संपत्ति के हिसाब से देखा जाए तो 2008 में 3.05 करोड़ रुपये, 2013 में 10.83 करोड़ 2015 के चुनाव में 6.29 करोड़ प्रति विधायक औसत संपत्ति रही.

समय के साथ बदलाव भी देखने को मिला है. करोड़पति उम्मीदवार के जीतने की संभावना 2008 में 26% थी, जो 2015 में घटकर 19% रह गयी. जबकि, गैर-करोड़पति के जीतने की संभावना 2008 में 3% थी, जो 2015 में बढ़ कर 6% हो गयी.

पढ़ी लिखी दिल्ली में कम पढ़े लिखों की भागीदारी

अंतिम और सबसे हैरान करने वाला आंकड़ा जो सामने आई है वह है पढ़े लिखों के बीच कम पढ़े लिखों की भागीदारी. अधिकतर उम्मीदवार 12 वीं पास रहे हैं. 2008 में 790 में से 483 (61%), 2013 में, 796 में से 479 (60%), जबकि 2015 में 673 उम्मीदवारों में से 374 (56%) ने घोषित किया कि उनके पास 12 वीं पास या उससे नीचे की शैक्षणिक योग्यता थी.

ये थोड़ा शुकुन देने वाला है

इन तमाम आंकड़ों के बीच तसल्ली देने वाली खबर यह है कि दिल्ली की विधानसभा चुनाव में महिलाओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ा है. 2008 में 790 उम्मीदवारों में से 57 (7%), 2013 में 796 उम्मीदवारों में से 69 (9%) और 2015 में 673 उम्मीदवारों में से 66 (10%) महिलाएं थीं.

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Prakash Pandey

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