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माटी के रंग

समीक्षा : कवि और कविता में पढ़ सकते हैं समय के निशान

  • समीक्षक : ललित शौर्य
  • काव्य संग्रह: कवि और कविता
  • प्रकाशक: शब्दअंकुर प्रकाशन
  • मूल्य : 100रूपये मात्र

कविताओं में यदि चैतन्यता हो तो वो हर कालखंड को स्पन्दित करती हैं. ये मायने नहीं रखता है कि उस समय उन कविताओं का सृजनकर्ता है अथवा नहीं. दरअसल कविताओं का वास्तविक मूल्यांकन तो उसके प्रभाव से ही किया जा सकता है. अगर कवितायें पाठक को प्रभावित कर रही हैं, उसके अन्दर विषयानुरूप भाव पैदा कर रही हैं तो कविता सफल है. कवि का श्रम भी. आज डिजिटल युग में कविताओं की बाढ़ सी आ गई है. ऐसे में कविता केवल अपने छोड़े गए प्रभाव से ही जीवित रह सकती है. वो किसी के कंधे में सवार होकर दशकों तक नहीं चल सकती.

कविता संग्रह कवि और कविता पढ़ने को मिला. जिसके लेखक स्व.मोहन चन्द्र जोशी थे. ये संग्रह कवि के मृत्यु के दो दशक बाद प्रकाशित हुवा है. इसका श्रेय लेखक के पुत्र एवं पुत्रियों को जाता है. जिन्होंने कवि के रचनाकर्म को इतने वर्ष संजों कर रखा. साथ ही उसे किताब का रूप भी प्रदान किया. कवि मोहन चन्द्र जोशी आज अपनी कविताओं के रूप में हमारे बीच जीवित हैं. हम उन्हें महसूस कर सकते हैं. उनके विचारों एवं भावों को जान सकते हैं. किसी ने सच ही कहा है , “सृजनकर्ता कभी मर नहीं सकता है. शब्द ब्रह्म है. जो अमर है.”
कविता संग्रह में छोटी बड़ी चौसठ कवितायें हैं , जो भिन्न-भिन्न विषयों पर लिखी गई हैं. संग्रह की पहली कविता, कवि और कविता अद्भुत है. जिसमें कवि ने कवि और कविता को आपस में जोड़ते हुए लिखा है, “कवि मन की तुम सजग कल्पना, कवि सरिता तुम कल-कल गान.” कवि ने कविता को मन की सजग कल्पना बताया है. कल्पना में सजगता अनिवार्य है. व्यर्थ और कोरी कल्पनायें कविता का आधार नहीं होनी चाहिए.वहीँ कवि स्वयं को नदी बताता है और कविता को नदी का मधुर कल-कल निनाद.

संग्रह में देश भक्ति से ओतप्रोत रचनाओं के साथ दया-धर्म से जुड़ी कवितायें भी हैं. जो लेखक की राष्ट्रीय एवं आध्यात्मिक भावों को पुष्ट करती हैं. कविता “भीष्म प्रतिज्ञा” संग्रह की शानदार कविता है.जिसमें कवि के कविताई कौशल के दर्शन होते हैं.
कवि लिखता है :- “जब बाँस ही होता नहीं, तो बाँसुरी बजती नहीं
कोई न वंशज अन्य हो, फिर और किसकी डर रही
सुनकर प्रतिज्ञा घोर यह, आश्चर्य सब करने लगे
करि पुष्प वर्षा स्वर्ग से , सब देवगण कहने लगे”
संग्रह में लम्बी कविताओं के साथ छोटी-छोटी व्यंग्य कवितायेँ भी हैं. जिससे कवि के भीतर बैठे व्यंग्यकार के दर्शन भी होते हैं. कविता रिसर्च में कवि लिखते हैं:
“जबसे वो बेलन के डर से
सामने नहीं आ रहे हैं
पत्नी भी गाईडेड-मिसाइल युक्त बेलन
में रिसर्च कर रही है.
वहीँ एक और अन्य कविता गागर में कवि कहते हैं-
खेत हरे पर रीती गागर
क्रय शक्ति नहीं रह गई मगर
चीजों का लहराता सागर
खेत हरे पर रीती गागर
इसके अलावा संग्रह की आसपास से, भुलाया नहीं जाता, छापा पड़ गया,इमारत,सस्ता बारूद समेत सभी कवितायें बेहद पठनीय है. किसी कवि के जाने के बीस साल बाद उसका कविता संग्रह आना एक बड़ी घटना है. ये कवि को बड़ी श्रधान्जली भी है. निश्चित रूप से “कवि और कविता” काव्य संग्रह हिंदी के साहित्यिक भण्डार में श्रीवृद्धि करने में सक्षम है.