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नवरात्र विशेष:क्या आप जानते हैं 51 शक्ति पीठ और उनके रहस्य को,अगर नहीं तो आज जान लीजिए

देश मे आजकल नवरात्र पूजा चल रहा है भक्तजन अपनी पूरी श्रद्धा से मां को मना लेना चाहते हैं. भक्ति भाव से सराबोर भक्तों की पूजा अर्चना सेवा देखते ही बनती है. भक्ति से भरे श्रद्धालुओं के लिए आज नवरात्र विशेष के पढ़ने से उन जानकारियों को हासिल करने में सहायता मिलेगी जिसे बहुत कम लोग जानते हैं. हम आज आपसे 51 शक्तिपीठों से जूस रहस्य साझा कर रहे है.

।। अमलेश नंदन ।।

नवरात्र में माता दुर्गा के विभिन्‍न रूपों की पूजा से कई शुभकारी फलों की प्राप्ति होती है. देश विदेश के विभिन्‍न मंदिरों में देवी दुर्गा की पूजा होती है. नवरात्र के पावन अवसर पर हम आपके लिए 51 शक्तिपीठों की जानकारी लेकर आये हैं. पुराणों के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति ने जब भगवान शिव का अपमान किया और यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया तो इससे कुपित माता सती हवन कुण्‍ड में कूदकर अपने देह का त्‍याग कर दिया. इसके बाद भगवान शिव वहां पहुंचे और सती के पार्थिव देह को कंधे पर लेकर तांडव करने लगे.

शिव के तांडव से ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया. इसे रोकने के लिए भगवान विष्‍णु ने सुदर्शन चक्र से देवी सती के देह के कई टुकड़े कर दिये. जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किये वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां भगवान शिव ने स्‍वयं शक्तिपीठों की स्‍थापना की. इन सभी शक्तिपीठों के बारे में एक साथ आपको हम यहां जानकारी दे रहे हैं. देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है. लेकिन हम देवी भागवत की बात करें तो शक्तिपीठों की संख्‍या 108 बतायी गयी है. देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का वर्णन मिलता है. जबकि तन्त्रचूड़ामणि में 52 शक्तिपीठ बताये गये हैं.

प्रसिद्ध कथा

पुरानों में एक कथा का जिक्र है वह यह है कि राजा प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में माता दुर्गा ने सती के रूप में जन्म लिया था और भगवान शिव से विवाह किया था. लेकिन प्रजापति दक्ष इस विवाह से प्रशन्‍न नहीं थे. एक बार मुनियों का एक समूह यज्ञ करवा रहा था. यज्ञ में सभी देवताओं को बुलाया गया था. जब राजा दक्ष वहां आये तो सभी लोग खड़े हो गये लेकिन भगवान शिव खड़े नहीं हुए. राजा दक्ष अपने दामाद शिव के इस व्‍यवहार से बेहद क्रोधित हुए.

दक्ष अपने दामाद भगवान शिव को हमेशा निरादर भाव से देखते थे. इस घटना के बाद राजा दक्ष ने कनखल (वर्तमान में हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व/ब्रिहासनी’ नामक यज्ञ का आयोजन किया. राजा दक्ष ने उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता और सती के पति भगवान शिव को इस यज्ञ में शामिल होने के लिए निमंत्रण नहीं भेजा.

नारद जी ने यह बात माता सती को बतायी. यह जानकर सती क्रोधित हो उठीं. नारद ने उन्हें सलाह दी कि पिता के यहां जाने के लिए बुलावे की जरूरत नहीं होती. नारद की बात सुनकर सती अपने पिता के घर जाने के लिए तैयार हुईं, तब भगवान शिव ने उन्‍हें मना किया. लेकिन सती नहीं मानी और शिव जी के रोकने के बाद भी जिद कर यज्ञ में शामिल होने चली गयीं.

यज्ञ-स्थल पर सती ने देखा कि सभी देवी-देवताओं के लिए सिंहासन है, लेकिन भगवान शिव के लिए कोई सिंहासन नहीं है. इससे वह क्रोधित हो उठीं. उन्‍होंने अपने पिता दक्ष से भगवान शिव को आमंत्रित न करने का कारण पूछा. इस पर दक्ष ने भगवान शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही. अपने पति के अपमान को देवी सहन न कर सकीं और वहीं यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपने देह का त्‍याग कर दिया. भगवान शिव को जब इस घटना के बारे में पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया. भगवान शिव के आदेश पर वीरभद्र ने दक्ष प्रजापति का सिर काट दिया.

यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकालकर भगवान शिव ने कंधे पर उठा लिया और सती के वियोग में सम्पूर्ण भूमंडल पर तांडव करने लगे. देवताओं ने देखा कि यदि भगवान शंकर शांत नहीं हुए तो पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी. पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देखकर और देवों के अनुनय-विनय पर भगवान विष्णु ने शिव को सती के देह मोह से मुक्‍त करने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को कई टुकड़ों में बांट दिया. तब श्री हरि विष्‍णु के समझाने पर शिव सती के देह वियोग से मुक्‍त हुए. विष्‍णु के आग्रह पर ही शिव ने उन सभी जगहों पर शक्तिपीठ की स्‍थापना की, जहां सती के अंग, वस्‍त्र और आभूषण गिरे. इस प्रकार कुल 51 स्थानों पर माता की शक्तिपीठों की स्‍थापना हुई. अगले जन्म में सती ने राजा हिमवान (हिमालय) के घर माता पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर शिव को पुन: पति रूप में प्राप्त किया.

51 शक्ति पीठों का वर्णन

  1. किरीट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल

किरीट शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट पर लालबाग कोट पर स्थित है. मान्‍यता है कि यहा माता सती का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा था. यहां की शक्ति देवी के रूम में विमला माता या भुवनेश्वरी की पूजा होगी है. कोलकाता से मुर्शिदाबाद की दूरी 239 किलोमीटर है.

  1. कात्यायनी शक्तिपीठ

कात्यायनी शक्ति पीठ वृंदावन, मथुरा, उत्‍तर प्रदेश के भूतेश्वर में स्थित है. माना जाता है कि यहां माता सती के बाल के गुच्छे गिरे थे. वृंदावन, आगरा से 50 किलोमीटर और दिल्ली से 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. निकटतम रेलवे स्टेशन मथुरा, 12 किमी की दूरी पर है. यहां माता की पूजा कात्‍यायनी देवी के रूप में की जाती है.

  1. करविपुर शक्तिपीठ

करविपुर शक्ति पीठ महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है. मान्‍यता है कि यहां सती माता का त्रिनेत्र गिरा था. यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव क्रोधशिश हैं. इस शक्तिपीठ को महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है. कोल्हापुर सड़क, रेलवे और वायु मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है. निकटतम बस स्टैंड कोल्हापुर में है. हैदराबाद, मुंबई आदि जैसे विभिन्न शहरों से कई सीधी बसें यहां के लिए मिलती हैं. निकटतम रेलवे स्टेशन कोल्हापुर है.

  1. श्री पर्वत शक्तिपीठ

श्री पर्वत शक्ति पीठ को लेकर विद्वानों में मतांतर है. कुछ विद्वानों का मानना है कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ का मानना है कि यह असम के सिलहट में है. कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र के पर्वत पर माता के दाएं पैर की पायल गिरी थी. जुलाई से सितंबर तक सड़क से जाने के लिए सबसे अच्छा समय माना जाता है. नजदीकी रेलवे स्टेशन जम्मूतवी है जो लद्दाख से 700 किमी दूर है. निकटतम हवाई अड्डा लेह में है.

  1. विशालाक्षी शक्तिपीठ

विशालाक्षी शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है. मान्‍यता है कि शक्तिपीठ जहां माता सती के दाहिने कान के बाली गिरी थी. वाराणसी के दो प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं. शहर के केंद्र में वाराणसी जंक्शन, और दीनदयाल उपाध्‍याय (मुगलसराय) जंक्शन शहर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है. वाराणसी हवाई अड्डा शहर के केंद्र से लगभग 25 किलोमीटर दूर है.

  1. गोदावरी तट शक्तिपीठ

गोदावरी तट शक्तिपीठ आंध्रप्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित है. मान्‍यता है कि यहां माता का बायां कपोल (गाल) गिरा था. निकटतम रेलवे राजमुंदरी है, जो काफी कम दूरी पर स्थित है. राजमुंदरी रेलवे स्टेशन आंध्र प्रदेश के सबसे बड़े रेलवे स्टेशनों में से एक है. इस मंदिर के निकट प्रमुख शहरों में हवाई अड्डे की सेवाएं उपलब्ध हैं. राजमुंदरी हवाई अड्डा मधुरपाड़ी के पास स्थित है, वह शहर से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर है.

  1. शुचीन्द्रम शक्तिपीठ

सुचीन्द्रम शक्तिपीठ कन्याकुमारी के त्रिसागर संगम स्थल पर स्थित है. तमिलनाडु के कन्याकुमारी-तिरुवनंतपुरम मार्ग पर शुचितीर्थम शिव मंदिर है. यहां पर माता की ऊपरी दंत (ऊर्ध्वदंत) गिरे थे. कन्याकुमारी तक पहुंचने के लिए रेलवे सबसे सामान्य साधन है. कन्याकुमारी से मंदिर तक पहुंचने के लिए स्थानीय परिवहन की आवश्यकता पड़ती है. निकटतम हवाई अड्डा त्रिवेन्द्रम है.

  1. पंचसागर शक्तिपीठ

पंचसागर शक्तिपीठ इस शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है लेकिन यहां माता का नीचे के दांत गिरे थे. ऐसा कहा जाता है कि यह शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के वाराणसी नगर में स्थित है. वाराणसी रेलवे स्‍टेशन से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है. हवाई मार्ग से भी आप वाराणसी पहुंच सकते हैं. शहर से एसरपोर्ट की दूरी 20 से 25 किलोमीटर है.

  1. ज्वालामुखी शक्तिपीठ

ज्वालामुखी शक्ति पीठ हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित है. मान्‍यता है कि यहां माता सती की जिह्वा गिरी थी. हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी में, पठानकोट-जोगिंदर नगर नैरोगेज रेलमार्ग पर ज्वालामुखी रोड स्टेशन से 21 किलोमीटर, कांगड़ा से 34 किलोमीटर तथा धर्मशाला से 56 किलोमीटर दूर कालीधर पर्वत की तलहटी में स्थित है. यहां मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है, बल्कि एक ज्‍वाला के रूप में मां प्रज्जवलित प्रस्फुटित होती हैं. यहां पर मंदिर के अंदर कुल 10 ज्योतियां निकलती हैं. दीवार के गोखले से 4, मध्य कुंड की भित्ति से 4, दाहिनी दीवार से एक तथा कोने से एक ज्‍योति निकलती है.

  1. भैरव पर्वत शक्तिपीठ

इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतभेद है. कुछ गुजरात के गिरिनार के निकट भैरव पर्वत को तो कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षीप्रा नदी तट पर वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं. माना जाता है कि यहां माता सती के ऊपरी होठ गिरे थे. दोनों स्थानों पर शक्तिपीठ की मान्यता है. शक्ति के अवंती होने से उज्जैन में शक्तिपीठ मान्‍यता ज्‍यादा है. उज्जैन भोपाल (मध्य प्रदेश राजधानी) से 185 किमी तथा इंदौर से 80 किलोमीटर नयी दिल्ली-पुणे रेलमार्ग पर स्थित है. उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भी दर्शनीय है.

  1. अट्टहास शक्तिपीठ

अट्टहास शक्ति पीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है. यहां माता का ‘अध्रोष्ठ’ यानी नीचे का होंठ गिरा था. यहां की शक्ति फुल्लरा तथा शिव विश्वेश हैं. पश्चिम बंगाल का लामपुर वर्धमान रेलवे स्टेशन से लगभग 95 किलोमीटर आगे कटवा-अहमदपुर रेलवे लाइन पर है. लामपुर रेलवे स्‍टेशन पास ही में है.

  1. जनस्थान शक्तिपीठ

जनस्थान शक्ति पीठ महाराष्ट्र नासिक के पंचवटी में स्थित है. यह प्रसिद्ध शक्तिपीठ महाराष्ट्र में मध्य रेलवे के मुम्बई-दिल्ली मुख्य रेल मार्ग पर, नासिक रोड स्टेशन से लगभग 8 किमी दूर पंचवटी नामक स्थान पर स्थित भद्रकाली मंदिर ही शक्तिपीठ है. यहां सती का ‘चिबुक’ भाग (ठोड़ी) गिरा था. यहां की शक्ति ‘भ्रामरी’ तथा शिव ‘विकृताक्ष’ हैं. इस मंदिर में शिखर नहीं है, सिंहासन पर नव-दुर्गाओं की मूर्तियां हैं, जिनके बीच में भद्रकाली की ऊंची मूर्ति है.

  1. कश्मीर शक्तिपीठ या अमरनाथ शक्तिपीठ

कश्मीर शक्ति पीठ और अमरनाथ शक्ति पीठ जम्मू-कश्मीर के अमरनाथ में स्थित है. यहां माता सती का कंठ गिरा था. अमरनाथ धाम विश्व प्रसिद्द बर्फानी शिव लिंग के साथ महामाया शक्तिपीठ की भी भक्तो में बहुत बड़ी मान्यता है. कहते हैं कि इस जगह ही भगवान शिव ने अपनी पत्नी पार्वती को अमरता का ज्ञान दिया था. यह मंदिर भी अमरनाथ की पवित्र गुफा में ही स्थित है. अमरनाथ शक्तिपीठ भारत के कश्मीर में श्रीनगर से 141 किमी की दूरी पर स्थित है.

  1. नंदीपुर शक्तिपीठ

नंदीपुर शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है. मान्‍यता है कि यहां देवी सती का कंठहार गिरा था. यहां कि शक्ति निन्दनी और भैरव निन्दकेश्वर हैं. बीरभूम तक आने के लिए विभिन्न स्थानों से कई सीधी बसें हैं. यह शक्ति पीठ स्थानीय रेलवे स्टेशन से केवल 10 मिनट की दूरी पर है. निकटतम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा कोलकाता में नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है.

  1. श्री शैल शक्तिपीठ

श्री शैल शक्ति पीठ आंध्रप्रदेश के कुर्नूल के पास है. माना जाता है कि यहां माता का ग्रीवा गिरा था. यहां की शक्ति महालक्ष्मी तथा भैरव संवरानंद अथवा ईश्वरानंद हैं. आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद से 250 किमी की दूरी पर कुर्नूल के पास श्री शैलम है. श्री शैल को ‘दक्षिण का कैलास’ और साथ ही ‘ब्रह्मगिरि’ भी कहते हैं. इसी स्थान पर भगवान शिव का मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग है. यहां का निकटस्थ रेलवे स्टेशन मरकापुर रोड है तथा निकटस्थ हवाई अड्डा हैदराबाद है.

  1. नलहटी शक्तिपीठ

नलहाटी शक्ति पीठ पश्चिम बंगाल के बोलपुर में स्थित है. मान्‍यता है कि यहां माता सती का उदरनली गिरा थी. यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव योगीश हैं. निकटतम बस स्टैंड नालहाटी बस स्टैंड है और निकटतम रेलवे स्टेशन नालहटी जंक्शन है. निकटतम हवाई अड्डा डमडुम, कोलकाता में स्थित है.

  1. मिथिला शक्तिपीठ

मिथिला शक्ति पीठ इसका निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है. स्थान को लेकर मतांतर है. तीन स्थानों पर मिथिला शक्तिपीठ को माना जाता है, वह है नेपाल के जनकपुर, बिहार के समस्तीपुर और सहरसा. यहां माता का वाम स्कंध (कंधा) गिरा था. यहां की शक्ति उमा या महादेवी तथा भैरव महोदर हैं. जनकपुर (नेपाल) से 15 किलोमीटर पूर्व की ओर मधुबनी के उत्तर पश्चिम में उच्चैठ नामक स्थान का ‘वनदुर्गा मंदिर’. दूसरा सहरसा स्टेशन के पास स्थित ‘उग्रतारा मंदिर’. तीसरा समस्तीपुर से पूर्व 61 किलोमीटर दूर सलौना रेलवे स्टेशन से नौ किलोमीटर आगे ‘जयमंगला देवी मंदिर’ है.

  1. रत्नावली शक्तिपीठ

रत्नावली शक्ति पीठ का भी स्थान ज्ञात है, बंगाज पंजिका के अनुसार यह तमिलनाडु के चेन्नई में कहीं स्थित है. रत्नावली शक्तिपीठ में माता का दक्षिण स्कंध (कंधा) गिरा था. यहां की शक्ति कुमारी तथा भैरव शिव हैं. बंगाल पंजिका के अनुसार यह तमिलनाडु के मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में कहीं है.

  1. अम्बाजी शक्तिपीठ

पुराने जूनागढ़ के गिरनार पर्वत के प्रथम शिखर पर देवी अम्बिका का भव्य-विशाल मंदिर है. कहते हैं पार्वती यहीं निवास करती हैं. अम्बिका (अम्बाजी) के इस मंदिर को शक्तिपीठ मानते हैं. पर्वत की चढ़ाई काफी ऊंची है. मान्‍यता है कि यहां माता का उदर गिरा था. हजारों सीढ़ियां पार करने पर तीन शिकरों की यात्रा होती है. इन शिखरों पर क्रमश: अम्बादेवी, योगाचार्य गोरखनाथ तथा दत्तात्रेय के स्थान हैं. यहां की शक्ति चन्द्रभागा तथा भैरव वक्रतुंड हैं. पश्चिमी रेलवे के राजकोट से दक्षिण पश्चिम जूनागढ़ स्थित है. जूनागढ़ के आगे पश्चिम में सोमनाथ पड़ता है.

  1. जालंधर शक्तिपीठ

जालंधर शक्ति पीठ शक्तिपीठ पंजाब के जालंधर में स्थित माना जाता है. यहां माता सती का वाम स्तन गिरा था. यहां की शक्ति ‘त्रिपुरमालिनी’ तथा भैरव ‘भीषण’ हैं. किन्तु वर्तमान में जालंधर नगर में कोई देवीपीठ नहीं मिलता. प्राचीन जालंधर से त्रिगर्त प्रदेश (वर्तमान कांगड़ा घाटी) को ही शक्तिपीठ माना जाता है. यहां ‘कांगड़ा शक्ति त्रिकोणपीठ’ की तीन जाग्रत देवियां – ‘चिन्तापूर्णी’, ‘ज्वालामुखी’ तथा ‘सिद्धमाता विद्येश्वरी’ विराजती हैं. यहां विश्वमुखी देवी का मंदिर है, जहां पीठ स्थान पर स्तन मूर्ति कपड़े से ढंकी रहती है और धातु निर्मित मुखमण्डल बाहर दिखता है.

  1. रामागिरि शक्तिपीठ

रामगिरि शक्तिपीठ की स्थिति को लेकर भी विद्वानों में मतांतर है. कुछ उत्तर प्रदेश के चित्राकूट तो कुछ मध्य प्रदेश के मैहर में मानते हैं, जहां माता का दाहिना स्तन गिरा था. यहां की शक्ति शिवानी तथा भैरव चण्ड हैं. रामागिरि पर्वत चित्रकूट में है.

  1. वैद्यनाथ शक्तिपीठ

वैद्यनाथ शक्तिपीठ झारखंड के देवघर में स्थित है वैद्यनाथ धाम मंदिर में बताया जाता है. मान्‍यता है कि यहां माता का हृदय गिरा था. यहां की शक्ति ‘जयदुर्गा’ तथा शिव ‘वैद्यनाथ’ हैं. एक मान्यतानुसार यहीं पर सती का दाह-संस्कार भी हुआ था. पटना से कोलकाता रेलमार्ग पर स्थित कियूल स्टेशन से 100 किमी दक्षिण में वैद्यनाथ धाम स्टेशन है. मेन लाइन पर जसीडीह रेलवे स्‍टेशन भी नजदीक ही है. यहां से बाबा वैद्यनाथ मंदिर की दूरी करीब 10 किलोमीटर है.

  1. वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ

वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ माता का यह शक्तिपीठ बंगाल के सैंथिया में स्थित है. पूर्वी रेलवे की मुख्य लाइन पर आण्डाल जंक्शन से सैंथिया लाइन पर आण्डाल से लगभग 39 किलोमीटर दूर एक छोटा सा स्टेशन है ‘दुब्राजपुर’. जहां से लगभग 12 किलोमीटर उत्तर में अनेक तप्त झरने हैं. वहीं पर शिव के अनेक शिवालय भी हैं. वाकेश्वर नाले के तट पर स्थित होने के कारण यह स्थान ‘वक्त्रेश्वर’ कहा जाता है.

  1. कन्याकुमारी शक्तिपीठ

कन्याकुमारी शक्ति पीठ तमिलनाडु के कन्याकुमारी के तीन सागरों हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी के संगम पर स्थित है. यहां भद्रकाली का मंदिर है. यह कुमारी देवी की सखी हैं. यह मंदिर ही शक्तिपीठ है. यहां देवी के देह का पृष्ठभाग गिरा था. यहां की शाक्ति शर्वाणि या नारायणी तथा भैरव निमिष या स्थाणु हैं. कन्याकुमारी एक अंतरीप तथा भारत की अंतिम दक्षिणी सीमा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां स्नानार्थी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है. कन्याकुमारी रेल तथा सड़क मार्ग से जुड़ा है. यह त्रिवेंद्रम से 80 किलोमीटर दूर है. यहां चेन्नई तथा त्रिवेंद्रम से रेल या बस से भी पहुंचा जा सकता है.

  1. बहुला शक्तिपीठ

बहुला शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के हावड़ा से 145 किलोमीटर दूर पूर्वी रेलवे के नवद्वीप धाम से 41 किमी दूर कटवा जंक्शन से पश्चिम की ओर ‘केतुग्राम’ या ‘केतु ब्रह्मगांव’ में स्थित है. यह पवित्र स्थल मां दुर्गा और भगवान शिव को समर्पित है. यहाँ की शक्ति ‘बहुला’ तथा भैरव ‘भीरुक’ हैं. कहीं से भी वर्धमान रेलवे स्टेशन के लिए ट्रेन पकड़कर बहुला मंदिर पहुंचा जा सकता है. यदि कोई पश्चिम बंगाल का रहने वाला है तो बस के माध्यम से बहुला पहुंच सकता है. राज्य में बहुला के लिए डीलक्स बसें चलायी जाती हैं. यहां का नजदीकी हवाईअड्डा वर्धमान है, जबकि यहां का अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा कोलकाता में है.

  1. उज्जयिनी शक्तिपीठ (हरसिद्धि शक्तिपीठ)

उज्‍जयिनी शक्तिपीठ मध्य प्रदेश के उज्जैन के पावन क्षिप्रा के दोनों तटों पर स्थित है. इस शक्तिपीठ की स्थिति को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं. कुछ उज्जैन के निकट शिप्रा नदी के तट पर स्थित भैरवपर्वत को, तो कुछ गुजरात के गिरनार पर्वत के सन्निकट भैरवपर्वत को वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं. अत: दोनों ही स्थानों पर शक्तिपीठ की मान्यता है. यहीं पार्वती हरसिद्धि देवी का मंदिर शक्तिपीठ, रुद्रसागर या रुद्र सरोवर नाम से तालाब के निकट है. इंदौर से 80 किलोमीटर दूर पुणे मार्ग पर स्थित उज्जैन प्राचीन काल से ही तीर्थस्थल रहा है. यहां का महाकालेश्वर मंदिर (ज्योतिर्लिंग) तथा बड़ा गणेश मंदिर, चिंतामणि गणेश मंदिर आदि दर्शनीय हैं.

  1. मणिवेदिका शक्तिपीठ

मणिवेदिका शक्तिपीठ राजस्थान के पुष्कर में स्थित है. इसे ही गायत्री मंदिर के नाम से जाना जाता है. मान्‍यता है कि यहीं माता की कलाइयां गिरी थीं. राजस्थान में अजमेर से 11 किलोमीटर दूर पुष्कर एक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल है. पुष्कर सरोवर के एक ओर पर्वत की चोटी पर स्थित है- सावित्री मंदिर, जिसमें मां की आभायुक्त, तेजस्वी प्रतिमा है तथा दूसरी ओर स्थित है गायत्री मंदिर है. यहां की सति ‘गायत्री’ तथा भैरव ‘शर्वानंद’ हैं. दिल्ली-अहमदाबाद मुख्य रेलमार्ग पर दिल्ली से 438 किमी तथा जयपुर से 134 किमी दूर अजमेर स्टेशन है. यहां से पुष्कर जाने के लिए ऑटो, टैक्सी, बस आदि मिलते हैं.

  1. प्रयाग शक्तिपीठ

प्रयाग शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित है. मान्‍यता है कि यहां माता के हाथ की अंगुलियां गिरी थी. इलाहाबाद में इस शक्तिपीठ के स्थानों को लेकर मतांतर है. यहां तीन मंदिरों को शक्तिपीठ माना जाता है और तीनों ही मंदिर प्रयाग शक्तिपीठ की शक्ति ‘ललिता’ के हैं. माना जाता है कि माता की अंगुलियां ‘अक्षयवट’, ‘मीरापुर’ और ‘अलोपी’ स्थानों पर गिरी थीं. इस शक्तिपीठ की शक्ति ‘ललिता’ तथा भैरव ‘भव’ हैं. अक्षयवट किले में ‘कल्याणी-ललिता देवी मंदिर’ के समीप ही ‘ललितेश्वर महादेव’ का भी मंदिर है. इलाहाबाद रेलवे से आसानी से पहुंचा जा सकता है.

  1. विरजाक्षेत्रा, उत्कल शक्तिपीठ

उत्कल शक्ति पीठ उड़ीसा के पुरी और याजपुर में माना जाता है. मान्‍यता है कि यहां माता का नाभी गिरा था. यहां की शक्ति विमला तथा भैरव जगन्नाथ पुरुषोत्तम हैं. कुछ विद्वान इसको ‘जगन्नाथपुरी’ में भगवान श्री जगन्नाथ जी के मंदिर के प्रांगण में स्थित भैरव ‘जगन्नाथ’ को पीठ मानते हैं. पुरी रेलवे स्‍टेशन यहां का निकटतम रेलवे स्‍टेशन है. एयरपोर्ट भुवनेश्‍वर में है.

  1. कांची शक्तिपीठ

कांची शक्तिपीठ तमिलनाडु राज्य के कांचीपुरम नगर में स्थित है. यहां देवी का कंकाल गिरा था. शक्ति ‘देवगर्भा’ तथा भैरव ‘रुरु’ हैं. यहां देवी कामाक्षी का भव्य विशाल मंदिर है, जिसमें त्रिपुर सुंदरी की प्रतिमूर्ति कामाक्षी देवी की प्रतिमा है. यह दक्षिण भारत का सर्वप्रधान शक्तिपीठ है. कांची के तीन भाग हैं- शिवकांची, विष्णुकांची, जैनकांची. ये तीनों अलग नहीं हैं. शिवकांची नगर का बड़ा भाग है, जो स्टेशन से लगभग-2 किलोमीटर है. कांची, चेन्नई से 75 किलोमीटर दूर है. यहां का नजदीकी विमान स्थान चेन्नई है. ‘कांची’, चेन्नई, तिरुपति, बैंगलुरु से सीधे रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है तथा सड़क मार्ग से भी जुड़ा है.

  1. कालमाध्व शक्तिपीठ

कालमाध्व शक्तिपीठ इस शक्तिपीठ के बारे कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है. परन्तु, यहां माता का वाम नितम्ब गिरा था, ऐसी मान्‍यता है. यहां की शक्ति काली तथा भैरव असितांग हैं.

  1. शोण शक्तिपीठ (षोडश शक्ति पीठ)

शोण शक्तिपीठ मध्य प्रदेश के अमरकंटक के नर्मदा मंदिर में स्थित है. मान्‍यता है कि यहां माता का दक्षिण नितम्ब गिरा था. एक दूसरी मान्यता यह है कि बिहार के सासाराम का ताराचण्डी मन्दिर ही शोण तटस्था शक्तिपीठ है. यहां सती का दायां नेत्रा गिरा था ऐसा माना जाता है. यहां की शक्ति नर्मदा या शोणाक्षी तथा भैरव भद्रसेन हैं. मध्य प्रदेश के अमरकण्टक के नर्मदा मंदिर में सती के दक्षिणी नितम्ब गिरा था और वहां के इसी मंदिर को शक्तिपीठ कहा जाता है. यहां माता सती ‘नर्मदा’ या ‘शोणाक्षी’ और भगवान शिव ‘भद्रसेन’ कहलाते हैं.

  1. कामाख्या शक्तिपीठ

कामाख्या शक्तिपीठ असम गुवाहाटी के कामगिरि पर्वत पर स्थित है. मान्‍यता है कि यहां माता का योनि गिरा था. यहां की शक्ति कामाख्या तथा भैरव उमानन्द हैं. गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से 10 किमी दूर नीलांचल पर्वत है. कामाख्या देवी का मन्दिर पहाड़ी पर है, अनुमानत: एक मील ऊंची इस पहाड़ी को नील पर्वत भी कहते हैं. पूर्वोत्तर के मुख्य द्वार कहे जाने वाले असम की नयी राजधानी दिसपुर से नालांचल पर्वतामलाओं की दूरी 6 किमी है. गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से 10 किलो मीटर दूर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए आटोरिक्शा आदि भी उपलब्ध हो जाते हैं. गुवाहाटी रेल, सड़क तथा वायुमार्ग से पहुंचा जा सकता है.

  1. जयंती शक्तिपीठ

जयंती शक्ति पीठ मेघालय के जयंतिया पहाड़ी पर स्थित है. मान्‍यता है कि जहां माता का वाम जंघा गिरा था. यहां की शक्ति जयन्ती तथा भैरव क्रमदीश्वर हैं. भारत के पूर्वीय भाग में स्थित मेघालय एक पर्वतीय राज्य है और गारी, खासी, जयंतिया यहां की मुख्य पहाड़ियां हैं. संपूर्ण मेघालय पर्वतों का प्रांत है. यहां की जयंतिया पहाड़ी पर ही ‘जयंती शक्तिपीठ’ है. यह शक्तिपीठ शिलांग से 53 किमी दूर जयंतिया पर्वत के बाहर भाग ग्राम में स्थित है. शिलांग रेलमार्ग से नहीं जुड़ा है, अत: निकटस्थ रेलवे स्टेशन गोलपारा टाउन है या लुमडिंग है. रेलवे स्‍टेशन से यात्रा सड़क मार्ग से की जा सकती है.

  1. मगध शक्तिपीठ

बिहार की राजधानी पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है. मान्‍यता है कि यहां माता का दाहिना जंघा गिरा था. यहां की शक्ति सर्वानंदकरी तथा भैरव व्योमकेश हैं. यह मंदिर पटना सिटी चौक से लगभग 5 किमी पश्चिम में महाराज गंज में स्थित है. बिहार की राजधानी पटना हावड़ा, दिल्ली रेलमार्ग पर स्थित है. यहां हवाई मार्ग से भी पहुंचा जा सकता है.

  1. त्रिस्तोता शक्तिपीठ (त्रिश्रोता शक्तिपीठ)

पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के शालवाड़ी गांव में तीस्ता नदी पर स्थित है. त्रिस्तोता शक्तिपीठ, जहां माता का वाम पाद (पैर) गिरा था. यहां की शक्ति भ्रामरी तथा शिव ईश्वर हैं. पूर्वोत्तर रेलवे के सिलीगुड़ी-हल्दी बाड़ी रेलवे लाइन पर स्थित है. रेलवे स्टेशन जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल में स्थित है.

  1. त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ

त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ त्रिपुरा के राध किशोर ग्राम में स्थित है. यहां माता का दक्षिण पाद (पैर) गिरा था. यहां की शक्ति त्रिपुर सुन्दरी तथा भैरव त्रिपुरेश हैं. त्रिपुरसुंदरी का शक्ति-संप्रदाय में असाधारण महत्त्व है. इन्हीं के नाम पर सीमांत प्रदेश भारत के पूर्वोत्तर भाग में ‘त्रिपुरा राज्य’ नाम से स्थापित है. उदयपुर से माताबाड़ी के लिए बस, टैक्सी, ऑटोरिक्शा उपलब्ध हैं तथा मंदिर के निकट अनेक धर्मशालाएं एवं रेस्ट हाउस भी बने हुए हैं. दक्षिणी त्रिपुरा की प्राचीन राजधानी उदयपुर शहर से 3 किलोमीटर दूर त्रिपुर सुंदरी मंदिर है. वहां जाने के लिए अगरतला तक वायुयान से यात्रा करनी होगी. वहां से सड़क मार्ग ही मुख्य यातायात साधन है. यहां रेलमार्ग मात्र 64 किलोमीटर तक उपलब्ध है. कोलकाता से लामडिंग, वहां से सिलचर जाकर वायुमार्ग से यात्रा करना सुविधाजनक है.

  1. विभाष शक्तिपीठ

विभाष शक्ति पीठ पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के ताम्रलुक ग्राम में स्थित है. मान्‍यता है कि यहां माता का वाम टखना गिरा था. यहां की शक्ति कापालिनी, भीमरूपा तथा भैरव सर्वानन्द हैं. पश्चिम बंगाल राज्य के मिदनापुर के ताम्रलुक ग्राम में रूपनारायण नदी के तट पर स्थित वर्गभीमा का विशाल मन्दिर ही विभाष शक्तिपीठ है. यह मंदिर दक्षिण पूर्व रेलवे के कुड़ा स्टेशन से 24 किलोमीटर दूर है.

  1. देवीकूप पीठ या कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ

कुरुक्षेत्र शक्ति पीठ हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन के निकट द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है. कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ, जिसे श्री देवीकूप (भद्रकाली पीठ) के नाम से जाना जाता है. यहां सती के दाएं चरण (गुल्फ) का निपात हुआ था. यह शक्तिपीठ हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन तथा थानेश्वर रेलवे स्टेशन के दोनों ओर से 4 किलोमीटर दूर झांसी मार्ग पर, ‘द्वैपायन सरोवर’ के पास स्थित है. दिल्ली-अमृतसर रेलमार्ग पर कुरुक्षेत्र स्टेशन दिल्ली से 55 किलोमीटर दूर है. सड़क मार्ग से मंदिर दिल्ली-अम्बाला मार्ग (जीटी रोड) प्रियली बस अड्डे से 9 किलोमीटर दूर है. यहाँ सती के दाएँ चरण (गुल्फ) का निपात हुआ था।

  1. युगाद्या शक्तिपीठ, क्षीरग्राम शक्तिपीठ (उघड़ा शक्तिपीठ)

युगाद्या शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बर्दमान जिले के क्षीरग्राम में स्थित है. मान्‍यता है कि यहां सती के दाहिने चरण का अंगूठा गिरा था. युगाद्या शक्तिपीठ बंगाल के पूर्वी रेलवे के वर्धमान जंक्शन से 39 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में तथा कटवा से 21 किमी दक्षिण-पश्चिम में महाकुमार-मंगलकोट थानांतर्गत ‘क्षीरग्राम’ में स्थित है. इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी ‘युगाद्या’ तथा भैरव ‘क्षीर कण्टक’ हैं. इस मंदिर में एक यात्री निवास भी है तथा यहां वर्धमान से बस द्वारा भी पहुंचा जा सकता है. त्रेता युग में अहिरावण ने पाताल में जिस काली की उपासना की थी, वह युगाद्या ही थीं.

  1. विराट का अम्बिका शक्तिपीठ (विराट नगर शक्तिपीठ)

अंबिका शक्तिपीठ राजस्थान के गुलाबी नगरी जयपुर के वैराट ग्राम में स्थित है, इसलिए इसका नाम विराट अंबिका शक्तिपीठ पड़ा है. मान्‍यता है कि यहां सती के दायें पांव की अंगुलियां गिरी थीं. यहां की शक्ति अंबिका तथा भैरव अमृत हैं. राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगरी जयपुर से उत्तर में महाभारत कालीन विराट नगर के प्राचीन ध्वंसावशेष के निकट एक गुफा है, जिसे ‘भीम की गुफा’ कहते हैं. जयपुर तथा अलवर दोनों स्थानों से विराट ग्राम तक आवागमन के लिए मार्ग हैं, जहां टैक्सी से जाना सुविधाजनक है.

  1. कालीघाट शक्तिपीठ (कालीघाट शक्तिपीठ)

पश्चिम बंगाल, कोलकाता के कालीघाट में काली मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध यह शक्तिपीठ स्थित है. मान्‍यता है कि यहां माता के दाएं पांव का अंगूठा छोड़ चार अन्य अंगुलियां गिरी थीं. यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव नकुलेश हैं. यहां का निकटतम रेलवे स्‍टेशन हावड़ा है. हावड़ा से यहांतक मेट्रो या अन्‍य साधनों से पहुंचा जा सकता है. हवाई मार्ग से यहां पहुंचने के लिए एयरपोट कोलकाता में है.

  1. मानस शक्तिपीठ (माणसा शक्तिपीठ)

देवी मां का यह शक्तिपीठ चीन अधिकृत मानसरोवर के तट पर है. मान्‍यता है कि यहां सती की ‘बायीं हथेली’ का निपात हुआ था. यहाँ की शक्ति ‘दाक्षायणी’ तथा भैरव ‘अमर’ हैं. मानसरोवर की यात्रा दुर्गम है. इसके लिए पहले पंजीकरण कराना होता है तथा चीन की वीजा लेनी पड़ती है. उत्तराखंड के काठगोदाम रेलवे स्टेशन से बस द्वारा अल्मोड़ा, वहां से पिथौरागढ़ जाया जाता है. दूसरा विकल्प यह है कि बस द्वारा काठगोदाम से वैद्यनाथ, वागेश्वर, डीडीहाट होकर पिथौरागढ़ पहुंचा जाए या सीधे टनकपुर रेलवे स्टेशन से पिथौरागढ़ जाया जाता है. वैसे नेपाल होकर भी मानसरोवर जाया जा सकता है. इधर से जाने पर काठमाण्डू से मानसरोवर लगभग 1000 किलोमीटर पड़ता है. यह यात्रा प्राइवेट टैक्सी या कार से करना सुविधाजनक है. नेपाल-चीन की सीमा पर फ़्रेण्डशिप ब्रिज है. यहां कस्टम क्लियरेंस तथा अन्य प्रमाण आदि की जांच की जाती है.

  1. लंका शक्तिपीठ

श्रीलंका में स्थित है लंका शक्तिपीठ, जहां माता का नूपुर गिरा था. यहां की शक्ति इन्द्राक्षी तथा भैरव राक्षसेश्वर हैं. लेकिन, उस स्थान ज्ञात नहीं है कि श्रीलंका के किस स्थान पर गिरे थे.

  1. गण्डकी शक्तिपीठ

गण्‍डकी शक्तिपीठ नेपाल में गण्डकी नदी के उद्गम पर स्थित है. मान्‍यता है कि यहां सती के दक्षिणगण्ड (कपोल) गिरा था. यहां शक्ति गण्डकी´ तथा भैरवचक्रपाणि´ हैं. नेपाल में गंडकी नदी के तट पर पोखरा नामक स्थान पर स्थित मुक्तिनाथ शक्तिपीठ स्थित है. काठमांडू से पोखरा और फिर पोखरा से जेमॉम हवाई अड्डे तक जाया जा सकता है. वहां से मुक्तिनाथ शक्तिपीठ तक जीप ली जा सकती है. काठमांडू (नेपाल की राजधानी) में एक समर्पित हवाई अड्डा है, और इस हवाई अड्डे में दोनों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित होती हैं.

  1. गुह्येश्वरी शक्तिपीठ

गुह्येश्वरी शक्तिपीठ नेपाल के काठमाण्‍डु में पशुपतिनाथ मंदिर के पास ही स्थित है. मान्‍यता है कि यहां माता सती के दोनों जानु (घुटने) गिरे थे. यहां की शक्ति महामाया´ और शिवकपाल´ हैं. नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर से थोड़ी दूर बागमती नदी की दूसरी ओर ‘गुह्येश्वरी शक्तिपीठ’ है. मंदिर में एक छिद्र से निरंतर जल बहता रहता है. यह शक्तिपीठ ‘किरातेश्वर महादेव मंदिर’ के समीप पशुपतिनाथ मंदिर से सुदूर पूर्व बागमती के दूसरी तरफ एक टीले पर विराजमान है. जनश्रुति के अनुसार कभी यहाँ ‘श्लेषमांत वन’ था, जहां अर्जुन की तपस्या पर शिव किरात रूप में मिले थे. इस शक्तिपीठ तक पहुंचने के लिए (वायु मार्ग से) काठमाण्डु हवाई अड्डे से गोशाला होते हुए टैक्सी/बस/टैम्पों से बागमती तट उतर कर पुल से दूसरी ओर जाया जा सकता है. सड़क मार्ग से काठमाण्डु बस अड्डे से रत्नपार्क शहीद फाटक होते हुए गोशाला तक पहुंचते हैं.

  1. हिंगलाज शक्तिपीठ

हिंगलाज शक्तिपीठ पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रांत में स्थित है. जहां माता का ब्रह्मरन्ध्र गिरा था. इस शक्तिपीठ में शक्तिरूप ज्योति के दर्शन होते हैं. गुफा में हाथ व पैरों के बल चलकर जाना होता है. मुसलमान हिंगुला देवी को ‘नानी’ तथा वहां की यात्रा को ‘नानी का हज’ कहते हैं. पूरे बलूचिस्तान के मुसलमान भी इनकी उपासना व पूजा करते हैं. हिंगलाज की यात्रा कराची से प्रारंभ होती है. कराची से लगभग 10 किलोमीटर दूर हॉव नदी है. वस्तुतः मुख्य यात्रा वहीं से होती है. हिंगलाज जाने के पहले लासबेला में माता की मूर्ति का दर्शन करना होता है. यह दर्शन ‘छड़ीदार’ (पुरोहित) कराते हैं. यहां से शिवकुण्ड जाते हैं, जहां अपने पाप की घोषणा कर नारियल चढ़ाते हैं. जिनकी पाप मुक्ति हो गयी और दरबार की आज्ञा मिल गयी, उनका नारियल तथा भेंट स्वीकार हो जाती है वरना नारियल वापस लौट आता है.

  1. सुगंधा शक्तिपीठ

सुगंधा शक्तिपीठ बांग्लादेश के खुलना में सुगंध नदी के तट पर स्थित है. मान्‍यता है कि यहां माता सती का नासिका गिरा था. यहां की देवी सुनन्दा है तथा शिव त्रयम्बक हैं. यह शक्तिपीठ भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में स्थित है. बरीसाल से 21 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर में शिकारपुर नामक ग्राम में सुगंधा (सुनंदा) नदी के तट पर स्थित उग्रतारा देवी का मंदिर ही शक्तिपीठ माना जाता है. खुलना से स्टीमर से बरीसाल पहुंचा जाता है और वहां से सड़क मार्ग से शिकारपुर ग्राम पहुंचा जा सकता है. बरिएसल सिटी में एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है. झालकाटी रेलवे स्टेशन निकटतम रेलवे स्टेशन है.

  1. करतोयाघाट शक्तिपीठ

करतोयाघाट शक्तिपीठ बंग्लादेश भवानीपुर के बेगड़ा में करतोया नदी के तट पर स्थित है. यहां माता का वाम तल्प (पायल) गिरा था. यहां देवी अपर्णा रूप में तथा शिव वामन भैरव रूप में वास करते हैं. यह शक्तिपीठ लाल मनीरहाट-संतहाट रेलवे लाइन पर बोंगड़ा जनपद में बोंगड़ा स्टेशन से दक्षिण-पश्चिम में 32 किलोमीटर दूर भवानीपुर ग्राम में है. लाल रंग के बलुहा पत्थर के बने इस मंदिर में चित्ताकर्षक टेराकोटा का प्रयोग हुआ है. श्रद्धालु ढाका से भानापुर जामुना ब्रिज तक जा सकते हैं. सिराजगंज जिले में चांदिकोना गुजरने के बाद, घोगा बोट-टूला बस स्टॉप पर पहुंचते हैं. यहां से भावानीपुर मंदिर पास ही है.

  1. चट्टल शक्तिपीठ

चट्टल शक्तिपीठ बंग्लादेश के चटगांव में स्थित है. कहा जाता है कि यहां माता का दाहिना बाहु यानी भुजा गिरा था. देवी का यह पीठ बांग्लादेश में चटगांव से 38 किलोमीटर दूर सीताकुण्ड स्टेशन के पास चंद्रशेखर पर्वत पर स्थित भवानी मंदिर में स्थित है. समुद्रतल से 350 मीटर की ऊंचाई पर यहां चंद्रशेखर शिव का भी मंदिर है. यहां की शक्ति भवानी तथा शिव चंद्रशेखर हैं. यहीं पर पास में ही सीताकुण्ड, व्यासकुण्ड, सूर्यकुण्ड, ब्रह्मकुण्ड, बाड़व कुण्ड, लवणाक्ष तीर्थ, सहस्त्रधारा, जनकोटि शिव भी हैं. बाडव कुण्ड से निरंतर आग निकलती रहती है. रेल गाड़ियां और बस, चटगांव से और ढाका से (6 घंटे), सिलेहट (6 घंटे) और अन्य शहरों से उपलब्ध हैं. यहां एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी है.

  1. यशोर शक्तिपीठ

यशोर शक्तिपीठ वर्तमान बांग्लादेश में खुलना जिले के जैसोर नामक नगर में स्थित है. यहां सती की बायीं हथेली का निपात हुआ था. यहां की सती ‘यशोरेश्वरी’ तथा शिव ‘चंद्र’ हैं. यह ईश्वरपुर, श्यामनगर उपनगर, सातखिरा जिला, बांग्लादेश में स्थित है. निकटतम हवाई अड्डा बांग्लादेश की राजधानी ढाका में स्थित है. इस हवाई अड्डे पर दोनों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित होती हैं. दोनों देशों के बीच कोई रेल मार्ग नहीं है, ऐसे में कुछ बसें हैं जो भारत के प्रमुख शहरों से इस पवित्र स्थल तक जाती हैं

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Prakash Pandey

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